एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड पदनाम देने संबंधी नियमों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड पदनाम देने संबंधी नियमों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड पदनाम देने संबंधी नियमों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज
Modified Date: November 29, 2022 / 08:08 pm IST
Published Date: November 16, 2022 7:02 pm IST

नयी दिल्ली, 16 नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने वकीलों को 2013 के उसके नियमों के तहत ‘एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड’ पदनाम देने की प्रथा को चुनौती देने वाली एक याचिका बुधवार को खारिज कर दी।

संविधान के अनुच्छेद 145 के तहत उच्चतम न्यायालय द्वारा तैयार किये गये नियमों के अनुसार, केवल ‘एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड’ के रूप में नामित अधिवक्ता ही शीर्ष अदालत में किसी वादी-प्रतिवादी के लिए पैरवी कर सकते हैं।

न्यायमूर्ति के एम जोसेफ और न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय की पीठ ने लिली थॉमस के मामले में 1964 की एक संविधान पीठ के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि शीर्ष अदालत के पास अधिवक्ताओं के एक विशेष वर्ग को ‘‘एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड’’ के रूप में नामित करने और उन्हें अपने समक्ष पैरवी करने के लिए विशेषाधिकार प्रदान करने की शक्ति है।

पीठ ने उच्चतम न्यायालय नियमावली, 2013 के आदेश चतुर्थ का उल्लेख करते हुए कहा, ‘‘ये नियम महज इस आधार पर अमान्य होने के लिए नहीं हैं कि यह किसी खास मामले में अन्याय की तरह भी हो सकता है।’’

पीठ ने कहा कि अगर पेशे से वकील याचिकाकर्ता नंदिनी शर्मा के पास किसी विशेष एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के खिलाफ शिकायत है, तो वह अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत उपाय तलाश सकती हैं।

शर्मा ने कहा कि नियम अनुचित और अव्यावहारिक हैं तथा अधिवक्ताओं की एक अलग श्रेणी बनाते हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें भी वे सभी तरह के काम की अनुमति दी जानी चाहिए, जिसे केवल ‘एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड’ द्वारा ही किये जाने की अनुमति दी जाती है।

उन्होंने दलील दी कि एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड को विशेष अधिकार प्रदान करने की प्रथा अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के प्रावधानों का उल्लंघन है। उन्होंने वकीलों के वर्गीकरण पर पटना उच्च न्यायालय के फैसले का हवाला भी दिया।

पीठ ने सुनवाई के दौरान शर्मा से कहा कि इस मुद्दे पर शीर्ष अदालत की एक संविधान पीठ का फैसला मौजूद है, जो अधिवक्ताओं को ‘एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड’ के पदनाम देने के प्रावधान की वैधता को बरकरार रखता है, जबकि याचिकाकर्ता पटना उच्च न्यायालय के फैसले पर भरोसा कर रही हैं।

भारतीय विधिज्ञ परिषद (बीसीआई) की ओर से पेश अधिवक्ता राधिका गौतम ने संविधान पीठ के 1964 के फैसले सहित शीर्ष अदालत के कई फैसलों का हवाला दिया और कहा कि शीर्ष अदालत ने लगातार कहा है कि पदनाम देने में कुछ भी गलत नहीं है।

उन्होंने दलील दी कि यदि याचिकाकर्ता को किसी विशेष ‘एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड’ के खिलाफ कोई शिकायत है, तो वह अधिवक्ता अधिनियम के तहत उपलब्ध उपाय तलाश सकती हैं।

भाषा सुरेश माधव

माधव


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