(सुष्मिता गोस्वामी)
गुवाहाटी, पांच अप्रैल (भाषा) असम में विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दल प्रभावशाली चाय बागान श्रमिकों का समर्थन हासिल करने के प्रयासों को तेज कर रहे हैं, जो एक ऐसा मतदाता समूह है जो दर्जनों निर्वाचन क्षेत्रों में परिणामों को तय कर सकता है।
चाय बागानों में करीब 35 लाख ऐसे मतदाता हैं जिनका मुख्यत: पूर्वी असम के 35 से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में दबदबा है तथा वे असम की 126 सदस्यीय विधानसभा की कम से कम दस और सीटों के चुनाव नतीजे पर भी असर डाल सकते हैं।
अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा, अधिक दिहाड़ी और भू-अधिकार समेत उनकी पुरानी मांगें एक बार फिर राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गई हैं।
सत्ताधारी भाजपा ने पिछले एक दशक में किए गए अपने कल्याणकारी कदमों को प्रमुखता से लोगों के सामने रखा है और दावा किया है कि चाय बागान श्रमिकों के जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
पार्टी ने विशेष रूप से चाय बागानों के भीतर भू- अधिकार प्रदान करने के अपने कदम पर बल दिया है।
भाजपा चाय मोर्चा के अध्यक्ष दुलेन नायक ने स्कूलों, सड़कों और कल्याणकारी योजनाओं जैसी पहलों का हवाला देते हुए कहा, ‘‘समुदाय को अब द्वितीय श्रेणी के नागरिक के रूप में नहीं माना जाता। शिक्षा से लेकर बुनियादी ढांचे तक, ठोस प्रगति हुई है।’’
भाजपा ने अपने कार्यकाल के दौरान पारिश्रमिक बढ़ाए पर भी जोर दिया, जो ब्रह्मपुत्र घाटी में 2016 में 126 रुपये से बढ़कर 280 रुपये और बराक घाटी में 105 रुपये से बढ़कर 258 रुपये हो गया था। भाजपा ने पुनः सत्ता में आने पर चरणबद्ध तरीके से मजदूरी बढ़ाकर 500 रुपये करने का वादा किया है।
पार्टी के अन्य कदमों में नौकरियों में आरक्षण, मेडिकल कॉलेजों में आरक्षित सीट और झूमोइर नृत्य जैसी सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देना शामिल हैं।
वहीं, विपक्षी कांग्रेस ने तर्क दिया कि सुधारों से जमीनी स्तर पर कोई सार्थक बदलाव नहीं आया है।
असम चाय मजदूर आदिवासी कांग्रेस के अध्यक्ष अतुवा मुंडा ने भूमि अधिकार पहल को सतही बताकर खारिज कर दिया।
उन्होंने आरोप लगाया कि हाल ही में वितरित किए गए ‘डिजिटल पट्टे’ कानूनी रूप से मान्य नहीं हैं और इनमें उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे श्रमिकों और चाय बागान प्रबंधन के बीच भविष्य में विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘ये टिकाऊ समाधान नहीं बल्कि चुनावी दिखावा मात्र हैं।’’
मुंडा ने प्रमुख वादों को पूरा करने में विफल रहने को लेकर भी भाजपा की आलोचना की, विशेष रूप से अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने और मजदूरी को 351 रुपये तक बढ़ाने के मामले में।
अपने चुनावी घोषणापत्र में, कांग्रेस ने चाय बागान श्रमिकों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने और औद्योगिक न्यूनतम मजदूरी एवं विस्तारित कल्याणकारी लाभों के साथ चाय क्षेत्र में जान फूंकने का वादा किया है।
इस बीच, झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) जैसे छोटे दल भी चुनावी मैदान में उतर चुके हैं, जिनका लक्ष्य चाय बागान जनजातियों के वोट बैंक को अपने पक्ष में करना है। हालांकि, इसका चुनावी प्रभाव अभी अनिश्चित है।
सभी पक्षों के आक्रामक प्रयासों के बावजूद, अनुसूचित जनजाति के दर्जे और पर्याप्त वेतन वृद्धि जैसे प्रमुख मुद्दे अब भी बने हुए हैं।
फिलहाल, चाय बागान समुदाय असम के राजनीतिक भविष्य को आकार देने में अपनी निर्णायक चुनावी ताकत को देखते हुए, अपने विकल्पों पर सावधानीपूर्वक विचार कर रहा है।
असम में नौ अप्रैल को विधानसभा चुनाव है और मतगणना चार मई को होगी।
भाषा राजकुमार नेत्रपाल
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