भुवनेश्वर, 27 जुलाई (भाषा) वार्षिक रथ यात्रा के समापन पर भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ के पुरी स्थित 12वीं सदी के मंदिर में लौटने के उपलक्ष्य में सोमवार को ओडिशा में ‘रसगुल्ला दिवस’ मनाया गया।
‘नीलाद्रि बीजे’ के अवसर पर ‘रसगुल्ला दिवस’ मनाया जाता है। नीलाद्रि बीजे वह अनुष्ठान है, जिसके तहत तीनों देवी-देवताओं की मंदिर में वापसी होती है। इसी दिन भगवान जगन्नाथ को विधिवत रसगुल्ले का भोग लगाया जाता है। मंदिर की परंपरा में इस रसगुल्ले को ‘खीरा मोहन’ कहा जाता है। वर्ष में केवल नीलाद्रि बीजे के दिन ही भगवान जगन्नाथ को रसगुल्ले का भोग लगाया जाता है।
हालांकि, मंदिर में यह परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन राज्य में ‘रसगुल्ला दिवस’ 2015 से मनाया जा रहा है।
ओडिशा के राज्यपाल हरि बाबू कंभमपति ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘पावन नीलाद्रि बीजे और रसगुल्ला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। महाप्रभु की असीम कृपा से सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आए।’’
मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने इस दिन को उड़िया अस्मिता, संस्कृति और भक्ति की अनूठी अभिव्यक्ति बताया।
उन्होंने कहा, ‘‘नीलाद्रि बीजे और रसगुल्ला दिवस के अवसर पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। भगवान श्रीजगन्नाथ का नीलाद्रि बीजे केवल आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक नहीं, बल्कि उड़िया अस्मिता, संस्कृति और भक्ति की अद्वितीय अभिव्यक्ति भी है।’’
पूर्व मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल (बीजद) के अध्यक्ष नवीन पटनायक ने कहा कि परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ रसगुल्ला भेंट कर महालक्ष्मी को मनाते हैं। रथ यात्रा में अपने साथ न ले जाने के कारण माता लक्ष्मी भगवान से नाराज रहती हैं।
पुरी मंदिर में, रसगुल्ले की उत्पत्ति से जुड़े ऐतिहासिक साक्ष्य जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले शोधकर्ता असित मोहंती ने कहा कि प्रारंभिक समय में मंदिर में इस मिष्ठान को ‘खीरा मोहन’ कहा जाता था और यही आज के समय का रसगुल्ला है।
ओडिशा को 29 जुलाई 2019 को छैना से बनी चाशनीयुक्त मिठाई ‘रसगुल्ला’ के लिए भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्राप्त हुआ था।
मोहंती ने कहा, ‘‘हमारा (ओडिशा का) रसगुल्ला बंगाल के रसगुल्ले से पूरी तरह अलग है। बंगाल का रसगुल्ला वर्ष 1868 में अस्तित्व में आया, जबकि हमारे यहां यह मिठाई 500 वर्ष से भी अधिक पुरानी है। बलराम दास द्वारा रचित ‘दांडी रामायण’ में भी रसगुल्ले का उल्लेख मिलता है।’’
उन्होंने कहा कि सदियों से नीलाद्रि बीजे के दिन भगवान जगन्नाथ को रसगुल्ले का भोग लगाया जाता रहा है, इसलिए इसकी उत्पत्ति को लेकर कोई विवाद नहीं होना चाहिए।
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