असम के मानस राष्ट्रीय उद्यान में वर्षों के संरक्षण प्रयासों के बाद गैंडों की संख्या 50 पार हुई: बरुआ

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असम के मानस राष्ट्रीय उद्यान में वर्षों के संरक्षण प्रयासों के बाद गैंडों की संख्या 50 पार हुई: बरुआ

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  • Publish Date - September 22, 2026 / 04:03 PM IST,
    Updated On - September 22, 2026 / 04:03 PM IST

गुवाहाटी, 22 सितंबर (भाषा) असम के पर्यावरण एवं वन मंत्री जयंत मल्ला बरुआ ने मंगलवार को कहा कि मानस राष्ट्रीय उद्यान में एक सींग वाले गैंडों की संख्या बढ़ने से यूनेस्को का यह विश्व धरोहर स्थल गुलजार हो गया है और अब यहां 50 से अधिक गैंडे हैं।

बरुआ ने विश्व गैंडा दिवस पर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा कि शिकार और संघर्ष के कारण वर्ष 1993 तक मानस राष्ट्रीय उद्यान में गैंडे पूरी तरह खत्म हो गए थे।

उन्होंने कहा कि इससे पहले उद्यान में करीब 75 से 100 गैंडे थे।

मंत्री ने कहा, ‘‘लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।’’

उन्होंने गैंडों को मानस में वापस लाने का श्रेय वर्षों के संरक्षण प्रयासों, प्राकृतिक आवास की सुरक्षा, गैंडों को दोबारा बसाने के कार्यक्रमों और समुदाय की भागीदारी को दिया।

बरुआ के अनुसार, उद्यान में अब 50 से अधिक एक सींग वाले गैंडे हैं और उनकी आबादी बढ़ रही है।

उन्होंने कहा कि यह इस बात का संकेत है कि गैंडे अपने बहाल किए गए प्राकृतिक आवास में खुद को ढाल रहे हैं।

उन्होंने कहा कि मानस राष्ट्रीय उद्यान में लगातार तीन वर्षों से गैंडों के शिकार का कोई मामला सामने नहीं आया है, जो वन विभाग के लगातार प्रयासों को दर्शाता है।

मानस राष्ट्रीय उद्यान को 1985 में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल और 1989 में जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया था।

बोडो उग्रवादियों की अशांति के बीच 1992 में इस उद्यान को यूनेस्को की ‘खतरे में पड़ी विश्व धरोहरों’ की सूची में शामिल किया गया था। इस अशांति के दौरान सैकड़ों पेड़ नष्ट कर दिए गए और वन्यजीवों को मार दिया गया। इस संघर्ष के कारण उद्यान के सभी गैंडे और करीब 50 प्रतिशत बाघ खत्म हो गए।

संरक्षण प्रयासों के बाद 2011 में उद्यान को ‘खतरे’ वाली श्रेणी से हटा दिया गया।

भाषा प्रचेता जोहेब

जोहेब