सरकार के खिलाफ नारेबाजी राजद्रोह का मामला दर्ज करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं: उच्च न्यायालय

Ads

सरकार के खिलाफ नारेबाजी राजद्रोह का मामला दर्ज करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं: उच्च न्यायालय

  •  
  • Publish Date - July 15, 2026 / 05:51 PM IST,
    Updated On - July 15, 2026 / 05:51 PM IST

चंडीगढ़, 15 जुलाई (भाषा) पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने कहा है कि निर्वाचित लोकतंत्र में सरकार या शासन के किसी भी सांविधिक निकाय के खिलाफ नारेबाजी करना नागरिकों पर राजद्रोह का आरोप लगाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।

अदालत ने कहा कि सरकार के खिलाफ नारे लगाना केवल असहमति व्यक्त करने का एक माध्यम है, न कि नफरत, अवमानना या असंतोष का भाव। उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी 2017 में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद हुई एक घटना से जुड़े मामले में कैथल के चार निवासियों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखते हुए की।

उच्च न्यायालय ने कहा कि हिंसक प्रदर्शन दंगा तो हो सकता है, लेकिन इस तरह की हिंसक गतिविधियों को सरकार के खिलाफ घृणा या अवमानना पैदा करने वाले कृत्य के रूप में नहीं देखा जा सकता।

कैथल के कलायत थाने में 25 अगस्त, 2017 को दर्ज प्राथमिकी में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124-ए (राजद्रोह), 188 (कानूनी आदेश की अवहेलना), 120-बी (आपराधिक साजिश) समेत सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम की धाराएं लगाई गई थीं।

पंचकूला की एक अदालत द्वारा गुरमीत राम रहीम सिंह को दोषी ठहराए जाने के बाद भड़की हिंसा में, हरियाणा के कैथल में भीड़ ने बिजली विभाग के दफ़्तर में कथित तौर पर तोड़-फोड़ की।

न्यायमूर्ति विनोद एस. भारद्वाज और न्यायमूर्ति सुखविंदर कौर की पीठ ने हरियाणा सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें 23 सितंबर, 2019 के निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी गई थी। निचली अदालत ने आरोपियों को आईपीसी की धारा 124-ए (राजद्रोह) समेत विभिन्न धाराओं के तहत आरोपों से बरी कर दिया था।

उच्च न्यायालय ने दो जुलाई के अपने आदेश में कहा, ‘‘इसके अलावा, आईपीसी की धारा 124-ए की शर्तें भी पूरी नहीं होती हैं। हिंसक विरोध-प्रदर्शन को भले ही दंगा माना जा सकता है, लेकिन हिंसा की ऐसी घटना को सरकार के प्रति नफ़रत या अवमानना ​​पैदा करने वाला कृत्य नहीं माना जाएगा।’’

पीठ ने कहा कि निर्वाचित लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार या शासन के अंगों के खिलाफ नारेबाजी करने के आधार पर नागरिकों पर राजद्रोह का आरोप नहीं लगाया जा सकता।

अदालत ने कहा, ‘‘निराशा, असंतोष या यहां तक कि आक्रोश का मतलब नाराजगी या नफरत नहीं है। इसलिए, अदालत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जब आरोप गंभीर हो और सजा कड़ी हो, तो अपराध के जरूरी तत्व और उनका अस्तित्व पूरी तरह से साबित हो।’’

पीठ ने कहा, ‘‘रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य केवल सरकार के खिलाफ नारेबाजी की ओर संकेत करते हैं, जो असहमति व्यक्त करने का एक माध्यम मात्र है, न कि घृणा, अवमानना या असंतोष का भाव।’’

पीठ को बताया गया कि यह प्राथमिकी उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम (यूएचबीवीएन) के कलायत उपमंडल अधिकारी की शिकायत पर दर्ज की गई थी। शिकायत में कहा गया था कि अगस्त 2017 में करीब 14-15 लोग लाठी, गंडासा और पेट्रोल से भरी बोतलें लेकर नारेबाजी करते हुए कार्यालय की ओर बढ़े थे। अपनी जान को खतरा महसूस करते हुए संबंधित अधिकारी और अन्य कर्मचारियों ने परिसर छोड़ दिया था।

अदालत ने यह भी कहा कि पहचान परेड कभी आयोजित नहीं की गई, जबकि यह दावा किया गया था कि किसी भी गवाह की आरोपियों से पहले कोई जान-पहचान नहीं थी। आरोपियों की पहचान पहली बार अदालत में पेशी के दौरान की गई।

पीठ ने कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में, जहां आरोपी की पहचान अभियोजन पक्ष के मामले का आधार होती है और गवाह आरोपी के लिए अनजान होते हैं, वहां पहचान परेड कराना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि यह स्पष्ट है कि निचली अदालत ने आरोपियों को केवल मामूली विसंगतियों के आधार पर बरी नहीं किया, बल्कि बरी किए जाने का फैसला महत्वपूर्ण विरोधाभासों, जरूरी तथ्यों के छूट जाने, संदिग्ध बरामदगी और विश्वसनीय पहचान के अभाव पर आधारित था।

पीठ ने कहा कि संदेह और अनुमान केवल संभावनाएं होते हैं, प्रमाण नहीं।

उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘इसलिए हम निचली अदालत के बरी करने के फैसले में ऐसी कोई विसंगति, साक्ष्यों की गलत व्याख्या या न्याय की विफलता नहीं पाते, जिसके आधार पर इस अदालत के अपीलीय अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।’’

भाषा आशीष सुरेश

सुरेश