नयी दिल्ली, छह जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर सौदे के संबंध में धनशोधन के आरोपों का सामना कर रहे एक वकील की उस याचिका को मंगलवार को खारिज कर दिया, जिसमें उसने पीएमएलए के एक प्रावधान की वैधता को चुनौती दी थी। न्यायालय ने कहा कि उसे आम नागरिकों की तरह ही मुकदमे का सामना करना चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने वकील गौतम खेतान द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करते हुए कहा, ‘‘सिर्फ इसलिए कि मैं अमीर हूं, मैं कानून की वैधता को चुनौती दूंगा… यह प्रथा बंद होनी चाहिए।’’
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘यह अब एक अनोखी प्रवृत्ति बन गई है। जब मुकदमा चल रहा होता है, तो धनी और संपन्न लोग कानून की वैधता को चुनौती देने के लिए इस अदालत का रुख करते हैं। यदि आप आरोपी हैं, तो किसी भी अन्य आम नागरिक की तरह मुकदमे का सामना करें।’’
खेतान ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 44(1)(सी) को चुनौती दी थी।
इस प्रावधान के अनुसार, यदि पीएमएलए से संबंधित विशेष अदालत के अलावा कोई अन्य अदालत किसी ‘‘अनुसूचित अपराध’’ (मूल अपराध) का संज्ञान लेती है, तो अधिकृत प्राधिकारी के आवेदन पर मामले को धन शोधन अपराध से निपटने वाले विशेष न्यायालय में स्थानांतरित किया जाना चाहिए।
इस प्रावधान का उद्देश्य क्षेत्राधिकार संबंधी विवादों को रोकना, मुकदमों को सुव्यवस्थित करना और एक ही अदालत को मूल अपराध तथा धन शोधन के आरोप दोनों पर निर्णय देने में सक्षम बनाकर एकरूपता सुनिश्चित करना है।
सुनवाई के दौरान, पीठ ने कहा कि वह धनी आरोपियों द्वारा आपराधिक मुकदमों के दौरान वैधानिक प्रावधानों की वैधता को चुनौती देने के लिए उच्चतम न्यायालय का रुख किए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति को स्वीकार नहीं करती।
खेतान की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि धारा 44(1)(सी) की संवैधानिक वैधता पर प्रश्न है और अदालत द्वारा इसकी पड़ताल किए जाने की आवश्यकता है।
पीठ ने कहा कि विजय मदनलाल मामले में उसके फैसले से उत्पन्न पुनर्विचार याचिकाओं में पीएमएलए के प्रावधानों की वैधता पहले से ही विचाराधीन है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘चूंकि पीएमएलए के प्रावधानों की वैधता से संबंधित मुद्दा कुछ पुनर्विचार याचिकाओं में विचाराधीन है, इसलिए हमें लगता है कि धारा 44(1)(सी) की वैधता की जांच उन कार्यवाही के दौरान की जानी चाहिए। हमें अलग से रिट याचिका पर विचार करने का कोई कारण नहीं दिखता।’’
पीठ ने याचिका खारिज कर दी, लेकिन कानूनी प्रश्न को खुला रखा। इसने कहा कि वह वरिष्ठ अधिवक्ता लूथरा को जारी पुनर्विचार याचिकाओं में हस्तक्षेप करने की स्वतंत्रता दे सकती है।
भाषा
नेत्रपाल दिलीप
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