mamta banarjee/ image source: ibc24 archive
Supreme Court Mamata Banerjee: नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की सियासत के बीच सुप्रीम कोर्ट से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए बड़ी और झकझोर देने वाली खबर सामने आई है। शीर्ष अदालत ने एक अहम मामले की सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री के आचरण पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी जांच प्रक्रिया के बीच में हस्तक्षेप करना बेहद गंभीर मामला है। यह पूरा विवाद कोलकाता में राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म आई-पैक (I-PAC) के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) की सर्च कार्रवाई से जुड़ा है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि कोई भी मुख्यमंत्री जांच एजेंसियों के काम में बाधा नहीं डाल सकता। इस टिप्पणी के बाद न सिर्फ कानूनी बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है, और इसे ममता सरकार के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि ऐसा दिन भी आएगा जब कोई मौजूदा मुख्यमंत्री खुद जांच के दौरान दखल देगा। कोर्ट ने साफ किया कि यह मामला केंद्र और राज्य के बीच टकराव का नहीं है, बल्कि यह उस स्थिति से जुड़ा है जहां एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। जस्टिस पीके मिश्रा ने कहा कि मुख्यमंत्री का यह कदम पूरे सिस्टम के लिए खतरा पैदा करता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर कर सकता है। अदालत ने इसे गंभीर चिंता का विषय बताते हुए कहा कि इस तरह की घटनाएं भविष्य में गलत उदाहरण पेश कर सकती हैं।
इस दौरान तृणमूल कांग्रेस (TMC) की ओर से पेश वकीलों ने दलील दी कि यह मामला संघीय ढांचे से जुड़ा हुआ है और इसे उसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट इस तर्क से सहमत नहीं दिखा। बेंच ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी परिस्थिति में मुख्यमंत्री जांच के दौरान हस्तक्षेप नहीं कर सकता और इसे केंद्र-राज्य विवाद का रूप देकर सही नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने संविधान विशेषज्ञों का हवाला देते हुए कहा कि एचएम सीरवाई और डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे दिग्गजों ने भी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की होगी, जहां एक वर्तमान मुख्यमंत्री खुद जांच स्थल पर पहुंचकर प्रक्रिया को प्रभावित करे।
सुनवाई के दौरान टीएमसी की वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाते हुए इसे पांच जजों की बड़ी बेंच को सौंपने की मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को भी खारिज कर दिया और पूछा कि इस मामले में ऐसा कौन सा बड़ा संवैधानिक प्रश्न है, जिसके लिए इसे बड़ी बेंच को भेजा जाए। अदालत ने साफ किया कि हर अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका को बड़ी बेंच के पास भेजना जरूरी नहीं है। यह सुनवाई ईडी अधिकारियों द्वारा दायर याचिकाओं पर हो रही है, जिनमें इस पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद यह मामला अब और ज्यादा संवेदनशील हो गया है और आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर बड़ा असर देखने को मिल सकता है।
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