Supreme Court on SIR West Bengal: एसआईआर मामले में CM ममता को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत.. नाम काटे जाने के बावजूद इस शर्त पर वोट डाल सकेंगे मतदाता, पढ़ें फैसला

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Supreme Court on SIR West Bengal: सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल एसआईआर मामले में राहत दी, शर्तों के साथ मतदाता चुनाव में वोट डाल सकेंगे

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  • Publish Date - April 16, 2026 / 07:11 PM IST,
    Updated On - April 16, 2026 / 07:13 PM IST

Supreme Court on SIR West Bengal || Image- ANI News File

HIGHLIGHTS
  • सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर मामले में मतदाताओं को बड़ी राहत दी
  • शर्तों के साथ हटे नाम वाले मतदाता भी वोट डाल सकेंगे
  • 91 लाख नाम हटने पर राज्य में बढ़ा था विवाद

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में एसआईआर को लेकर केंद्रीय चुनाव आयोग और टीएमसी के बीच पिछले दिनों भारी तनाव देखा गया था। दरअसल पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट से क़रीब 91 लाख वोटरों के नाम हटा दिए गए हैं। (Supreme Court on SIR West Bengal) यह काम राज्य की मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) के बाद हुआ। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। वही अब सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में टीएमसी को राहत दी है।

कौन कर सकेगा विधानसभा चुनाव में मतदान?

इस विषय पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि पश्चिम बंगाल में वे मतदाता, जिन्हें चुनाव से कम से कम दो दिन पहले अपीलीय न्यायाधिकरणों द्वारा मतदाता सूची में शामिल करने के लिए मंजूरी दे दी गई है, आगामी राज्य विधानसभा चुनावों में मतदान करने के हकदार होंगे।

सीजेआई सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने की सुनवाई

पश्चिम बंगाल में चुनाव दो चरण 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को होने वाले हैं। इसलिए, जो लोग 21 अप्रैल या 27 अप्रैल को या उससे पहले अपीलीय न्यायाधिकरणों द्वारा दोषमुक्त कर दिए जाएंगे, वे आने वाले चुनावों में मतदान करने के पात्र होंगे। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह आदेश पारित किया। (Supreme Court on SIR West Bengal) पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के चल रहे एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया गया।

एसआईआर के कारण मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर नामों को हटाने को लेकर बड़े पैमाने पर विवाद पैदा हो गया था। भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच विवादों के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने एसआईआर अभ्यास को पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड के न्यायिक अधिकारियों को सौंपने का निर्णय लिया था।

हटाए गये क़रीब 91 लाख वोटरों के नाम

गौरतलब हैं कि, पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट से क़रीब 91 लाख वोटरों के नाम हटा दिए गए हैं। यह काम राज्य की मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) के बाद हुआ। (Supreme Court on SIR West Bengal) यह संख्या राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 12% है, जो बीते साल अक्तूबर में एसआईआर शुरू होने के समय क़रीब 7.66 करोड़ थी।

क्या थी सीईसी के दलील?

इन 91 लाख में से 63 लाख से ज़्यादा वोटरों के नाम फ़रवरी में चुनाव आयोग की जारी सूची में ही हटा दिए गए थे। इन लोगों को “अनुपस्थित, कहीं और चले गए, मृत या डुप्लीकेट” बताया गया। इसके अलावा 60.06 लाख वोटरों को “अंडर एडजुडिकेशन” यानी जांच के दायरे में रखा गया है। चुनाव आयोग के मुताबिक़ इन लोगों के रिकॉर्ड में “तार्किक गड़बड़ियां” थीं, जैसे नाम की स्पेलिंग, जेंडर में ग़लती, माता-पिता से उम्र का असामान्य अंतर आदि।

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Q1. सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

कोर्ट ने शर्तों के साथ हटाए गए मतदाताओं को वोट डालने की अनुमति दी।

Q2. कौन से मतदाता वोट डाल सकेंगे?

जिन्हें चुनाव से पहले ट्रिब्यूनल से मंजूरी मिलेगी, वे मतदान कर सकेंगे।

Q3. विवाद क्यों हुआ था?

91 लाख मतदाताओं के नाम हटाने से बड़ा राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़ा हुआ।