अदालत ने फैसला हो चुके कई मामलों में व्यक्ति का नाम खोजने की सुविधा बंद करने का दिया निर्देश

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अदालत ने फैसला हो चुके कई मामलों में व्यक्ति का नाम खोजने की सुविधा बंद करने का दिया निर्देश

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  • Publish Date - June 1, 2026 / 05:29 PM IST,
    Updated On - June 1, 2026 / 05:29 PM IST

नयी दिल्ली, एक जून (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि गूगल जैसे सर्च इंजन उन मामलों में नाम-आधारित खोज के माध्यम से न्यायिक अभिलेखों को अनिश्चित काल तक प्रदर्शित नहीं कर सकते, जो निजी प्रकृति के हों या आरोपी के बरी होने, आरोपमुक्त किए जाने, कार्यवाही रद्द किये जाने अथवा समझौते के कारण मामले का निस्तारण हो चुका हो।

उच्च न्यायालय ने व्यक्ति के ‘भुला दिये जाने के अधिकार’ को मान्यता दी है।

याचिकाकर्ताओं के एक समूह को राहत देते हुए अदालत ने संबंधित प्राधिकारियों, विभिन्न ‘सर्च इंजन’ के संचालकों और कानूनी डेटाबेस मंचों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं द्वारा उद्धृत निर्णयों, आदेशों और समाचार लेखों के संबंध में अपनी नाम-आधारित खोज सुविधा को निष्क्रिय करें तथा उन्हें खोज परिणामों से हटा दें (डी-इंडेक्स करें)।

‘डी-इंडेक्स’ करने का अर्थ है किसी विशेष वेबपेज या वेबसाइट को सर्च इंजन के डेटाबेस से हटाना, ताकि वह सामान्य खोज परिणामों में दिखाई न दे।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि महिलाओं या बच्चों के विरुद्ध अपराधों, सार्वजनिक विश्वास के उल्लंघन से जुड़े अपराधों, लोकसेवकों, निर्वाचित प्रतिनिधियों आदि द्वारा किए गए अपराधों में दोषसिद्धि से संबंधित मामलों में ‘डी-इंडेक्स’ करना उपयुक्त नहीं होगा।

अपने 144 पृष्ठों के फैसले में न्यायालय ने फैसला सुनाया कि याचिकाकर्ताओं को संबंधित न्यायालय से मूल निर्णय या आदेश में खुद की पहचान छिपाने का अनुरोध करने की स्वतंत्रता होगी।

अदालत ने कहा, ‘‘जिन अभिलेखों की अंतर्निहित कार्यवाही संबंधित व्यक्ति के पक्ष में हल हो चुकी है, उनकी असीमित और अप्रतिबंधित नाम-आधारित खोज क्षमता से किसी भी वैध या विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती है।’’

हालांकि, अदालत ने पीपी माधवा को राहत देने से इनकार कर दिया, जिन्होंने खुद को एक सार्वजनिक हस्ती बताते हुए यौन अपराध के मामले में समझौते के बाद मामले को ‘डी-इंडेक्स’ करने का अनुरोध किया था।

अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक हस्ती के खिलाफ गंभीर आरोपों से संबंधित कार्यवाही की सुलभता जनहित में है।

अदालत ने ‘रियलिटी शो’ के मशहूर हस्ती आशुतोष कौशिक की राहत याचिका को भी खारिज कर दिया, जिन्होंने नशे में धुत व्यवहार की कई घटनाओं को दर्शाने वाली पोस्ट, वीडियो और लेख हटाने का अनुरोध किया था। अदालत ने कहा कि ‘भुला दिए जाने का अधिकार’ किसी सार्वजनिक हस्ती के अतीत के आचरण को ‘चुनिंदा रूप से हटाने’ का तंत्र नहीं है।

अदालत ने माना कि कुछ मामलों में, जैसे कि महिलाओं या बच्चों के खिलाफ अपराधों, जन विश्वास भंग करने से जुड़े अपराधों, लोक सेवकों, निर्वाचित प्रतिनिधियों आदि द्वारा किए गए अपराधों से जुड़े मामलों को खोज परिणामों से हटाया जाना (डी-इंडेक्सिंग) उचित नहीं है।

भाषा संतोष माधव

माधव