(कुणाल दत्त)
नयी दिल्ली, 20 सितंबर (भाषा) पश्चिम बंगाल में पुर्तगाली काल के एक चर्च की मीनार पर लगी घड़ी से लेकर मुंबई के 160 साल से अधिक पुराने प्रतिष्ठित घंटाघर तक, ये ऐतिहासिक धरोहरें एक सदी से भी अधिक पहले से भारत में समय के सार्वजनिक प्रहरी और इसकी कालातीत विरासत के प्रतीक के रूप में खड़ी हैं।
गौरव की भावना के साथ निर्मित और वास्तुशिल्पीय सजावट से अलंकृत समय के प्रहरी की तरह खड़े कई घंटाघरों ने साम्राज्यों के पतन, औपनिवेशिक शासन से भारत की आजादी और देश के गणराज्य बनने तक के दौर को देखा है।
एक नई कॉफी-टेबल पुस्तक में ऐसे 150 ऐतिहासिक स्थलों की कहानियों को उनके निर्माण काल के आधार पर क्रमानुसार प्रस्तुत किया गया है।
‘क्लॉक टावर्स ऑफ इंडिया: सेंटिनल्स ऑफ टाइम’ शीर्षक वाली करीब 300 पन्नों की इस पुस्तक में सार्वजनिक इमारतों में लगी घड़ियों का संग्रह दर्ज किया गया है। इनमें चर्च, मंदिर, रेलवे स्टेशन, डाकघर और नगर पालिकाओं के टाउन हॉल के अलावा औपनिवेशिक काल में बनाए गए स्वतंत्र घंटाघर भी शामिल हैं। इनमें से कई घंटाघर उन शहरों की पहचान बन चुके हैं, जिनके क्षितिज को वे आज भी सुशोभित करते हैं। इनका इतिहास 300 साल से अधिक पुराने कालखंड तक विस्तृत है।
पुस्तक में यह भी बताया गया है कि किस तरह एक ‘मास्टर’ घड़ी और उससे कुछ दूरी पर लगी छोटी सहायक घड़ियों की प्रणाली एक साथ काम करती थी।
लेखक देबाशीष दास ने इस रोचक व्यवस्था का उल्लेख ‘डेल्हीज 900 स्लेव’ शीर्षक से एक पत्रिका में प्रकाशित लेख के आधार पर किया है।
दास ने कहा कि उनका यह काम पांच साल की कड़ी मेहनत का नतीजा है, जो करीब 2020 में शुरू हुई थी। यह उन स्मारकों (घंटाघरों) के अध्ययन की इच्छा से उपजा, जिन्होंने शहरों को समय दिखया।
दास ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘कई लोगों की तरह मेरा भी यह मानना था कि सार्वजनिक घड़ियां ब्रिटिश राज के साथ आईं और वे मुख्य रूप से कुछ प्रसिद्ध स्मारकों तक ही सीमित थीं। लेकिन मिले साक्ष्यों ने एक कहीं अधिक समृद्ध कहानी सामने रखी — यह कहानी चर्च, यहूदी उपासना स्थलों (सिनागॉग), मंदिरों, बाजारों, रेलवे स्टेशनों, विश्वविद्यालयों, रियासतों और यहां तक कि समुद्री ढांचों से संबंधित है।’’
उन्होंने कहा कि हर घंटाघर ने इतिहास के एक ‘अनपेक्षित हिस्से’ का दरवाजा खोला।
यह पुस्तक विभिन्न प्रकार के घंटाघरों के कम दर्ज किए गए पहलुओं का विवरण देती है। इनमें मुंबई का डेविड ससून घंटाघर (1865), सूरत घंटाघर (1871), चेन्नई में पी. ऑर एंड संस भवन का हिस्सा रहा तीन मुख वाला घंटाघर (1866), मेयो कॉलेज घंटाघर (1885), महाराष्ट्र के कोल्हापुर में न्यू पैलेस घंटाघर (1884) और गुजरात के जामनगर में मांडवी घंटाघर (1884) शामिल हैं।
इसके अलावा पुस्तक में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ का हैरिसन घंटाघर (1894), लखनऊ का हुसैनाबाद घंटाघर (1881), मिर्जापुर का टाउन हॉल घंटाघर (1891) और प्रयागराज का चौक घंटाघर (1913) भी शामिल है।
हैदराबाद का महबूब चौक घंटाघर (1892), पश्चिम बंगाल का चिनसुराह घंटाघर (1914), मैसूर का सिल्वर जुबली घंटाघर (1927) और दिल्ली का श्री विश्वनाथ संस्कृत महाविद्यालय घंटाघर (1946) भी इस पुस्तक में दर्ज है।
भाषा संतोष दिलीप
दिलीप