नयी दिल्ली, 14 मार्च (भाषा) मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 का विरोध करते हुए शनिवार को आरोप लगाया कि प्रस्तावित संशोधन लैंगिक पहचान के आत्मनिर्णय के सिद्धांत को कमजोर करते हैं और ऐसे लोगों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन भी करते हैं। इसने विधेयक को वापस लिए जाने की मांग भी की।
पार्टी ने कामकाजी महिलाओं के लिए मासिक धर्म अवकाश की मांग करने वाली एक याचिका का निपटारा करते समय उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियों की भी आलोचना की। इसने कहा कि टिप्पणियां ‘‘नकारात्मक और भेदभावपूर्ण’’ हैं।
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने गत 13 मार्च को लोकसभा में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया। यह विधेयक 2019 के अधिनियम में संशोधन कर ‘ट्रांसजेंडर’ शब्द को सटीक परिभाषा प्रदान करता है।
माकपा ने कहा कि कुछ विशेष समुदायों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले विधेयक को हितधारकों के साथ विचार-विमर्श किए बिना पेश नहीं किया जाना चाहिए था।
वामपंथी पार्टी ने एक बयान में यह आरोप भी लगाया कि विधेयक खुद से लिंग की पहचान की स्वीकार्य व्यवस्था को खारिज करता है और इसके बजाय यह प्रावधान करता है कि एक मुख्य चिकित्सा अधिकारी की अध्यक्षता वाले मेडिकल बोर्ड द्वारा प्रमाणन की आवश्यकता होगी।
माकपा ने कहा, ‘‘ये प्रावधान सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित गोपनीयता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वायत्तता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।’’
इसने कहा कि संशोधनों से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ‘‘आक्रामक नौकरशाही और चिकित्सा निरीक्षण’’ का सामना करना पड़ेगा।
भाषा हक माधव नेत्रपाल
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