कोलकाता, 29 जून (भाषा) पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार का प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक सोमवार को विधानसभा में एक अनोखी राजनीतिक लड़ाई शुरू करने वाला है — यह लड़ाई न सिर्फ सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच होगी, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के उन दो विरोधी गुटों के बीच भी होगी, जो इस कानून के खिलाफ मुख्य आवाज बनने की होड़ में हैं।
राज्य में तृणमूल के 15 साल के शासन को खत्म करने के दो महीने से भी कम समय में, भाजपा सरकार अपने सबसे महत्वाकांक्षी और राजनीतिक रूप से संवेदनशील वादों में से एक को पेश करने वाली है। इससे चुनाव के बाद की अवधि के पहले बड़े वैचारिक टकराव की स्थिति बन सकती है।
यह बहस तृणमूल के विरोधी गुटों के लिए सदन में पहली बड़ी परीक्षा साबित हो सकती है। इन गुटों का नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री एवं पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी और विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी कर रहे हैं। पार्टी पर नियंत्रण को लेकर इनके बीच महीने भर से चल रही खींचतान के अब विधानसभा में भी सामने आने की उम्मीद है।
दोनों गुटों ने हालांकि विधेयक के विरोध के संकेत दिए हैं, लेकिन दोनों खेमों के अंदरूनी सूत्रों ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि वे अलग-अलग रणनीतियां बना रहे हैं और अलग-अलग वक्ताओं एवं राजनीतिक विमर्श का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे यह चर्चा न केवल सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच, बल्कि तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक विरासत पर दावा करने वाले प्रतिद्वंद्वियों के बीच भी एक मुकाबले में बदल गई है।
प्रस्तावित कानून का मकसद धर्म से अलग, शादी, तलाक, विरासत और गोद लेने से जुड़े मामलों के लिए एक साझा नागरिक ढांचा बनाना है, ताकि धर्म-आधारित कानूनों की जगह एक समान कानूनी व्यवस्था लागू की जा सके।
विधानसभा सूत्रों के अनुसार, सोमवार की कार्यवाही के दूसरे हिस्से में इस विधेयक पर चर्चा होने की संभावना है। इसमें मुख्यमंत्री, विपक्ष के नेता और कई वरिष्ठ विधायकों के लिए बोलने का समय तय किया गया है।
सदन में आरामदायक बहुमत होने के कारण, भाजपा को विधेयक पारित कराने में कोई खास मुश्किल नहीं होगी। हालांकि, राजनीतिक नज़रिये से सोमवार की बहस कहीं ज़्यादा अहम होने की उम्मीद है।
शुक्रवार को विधायकों और वरिष्ठ नेताओं के साथ हुई रणनीति बैठक में, ममता बनर्जी ने अपने ‘कालीघाट कैंप’ को निर्देश दिया कि वे विधानसभा के अंदर और बाहर इस प्रस्तावित कानून का कड़ा विरोध करें। उन्होंने तर्क दिया कि यह मुद्दा संवैधानिक सिद्धांतों, सामाजिक सहमति और भारत की विविधतापूर्ण प्रकृति से जुड़े सवाल खड़े करता है।
इस बीच, ऋतब्रत बनर्जी का खेमा स्वतंत्र रूप से तैयारी कर रहा है।
विपक्ष के नेता पहले ही इस कानून को लाने में सरकार की जल्दबाजी पर सवाल उठा चुके हैं।
भाषा प्रशांत सुरेश
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