आतंकी हमलों के बाद अब हम मोमबत्ती लेकर नहीं घूमते क्योंकि हमारे पास ब्रह्मोस है : आर्लेकर

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आतंकी हमलों के बाद अब हम मोमबत्ती लेकर नहीं घूमते क्योंकि हमारे पास ब्रह्मोस है : आर्लेकर

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  • Publish Date - January 30, 2026 / 04:34 PM IST,
    Updated On - January 30, 2026 / 04:34 PM IST

इंदौर, 30 जनवरी (भाषा) केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का हवाला देते हुए शुक्रवार को कहा कि ‘स्वबोध के जागरण’ के कारण आतंकी हमलों को लेकर देश की प्रतिक्रिया का स्वरूप बदल गया है और ऐसे हमलों के बाद दुश्मन को करारा जवाब दिया जा रहा है।

आर्लेकर ने मध्यप्रदेश के इंदौर में तीन दिवसीय साहित्योत्सव ‘नर्मदा साहित्य मंथन’ के उद्घाटन के अवसर पर यह बात कही।

उन्होंने कहा कि देश में पहले जब आतंकी हमले होते थे, तो लोग शाम के वक्त मोमबत्ती जलाकर मृतकों को श्रद्धांजलि देते थे और अपने घर लौट जाते थे, लेकिन अब माहौल बदल गया है।

आर्लेकर ने पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत के बाद भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का उल्लेख करते हुए कहा, ‘‘पहलगाम में आतंकी हमला केवल 26 लोगों पर नहीं हुआ था। यह हमला हम सब पर हुआ था। आप देखिए कि हमारी सरकार ने इस हमले पर किस तरह प्रतिक्रिया दी..ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया गया।’’

केरल के राज्यपाल ने ‘भारत उदय’ के विषय पर आयोजित साहित्योत्सव में कहा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद देखा गया कि आतंकी हमलों को लेकर देश की प्रतिक्रिया का स्वरूप बदल गया है।

उन्होंने कहा,‘‘अब हमारे हाथ में मोमबत्ती की जगह ब्रह्मोस (मिसाइल) आ गई है। जब स्वबोध का जागरण होता है, तब यह अंतर दिखाई देता है। अब हम (आतंकी हमलों के बाद) मोमबत्ती लेकर नहीं घूमते क्योंकि हमारे हाथ में ब्रह्मोस है।’’

आर्लेकर ने कहा कि केरल में करीब 250 वर्ष पहले ब्रितानी शासकों और संभवत: टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली ने नीला नदी के तट पर ‘महामाघ मेले’ का आयोजन बंद करा दिया था।

उन्होंने कहा, ‘‘केरल में 250 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद महामाघ मेला इस साल फिर से शुरू हो गया है। इस मेले में देश भर से बड़ी तादाद में श्रद्धालु आ रहे हैं। हमारे देश में स्वबोध और स्वजागरण का नया दौर शुरू हुआ है।’’

केरल के राज्यपाल ने यह भी कहा कि ब्रितानी शासनकाल में भारतीय संस्कृति की शिक्षा नीति को बढ़ावा देने के लिए जरूरी प्रयास नहीं किए गए थे।

आर्लेकर ने कहा, ‘‘तब (ब्रितानी शासनकाल में) स्वबोध नहीं होने के कारण हम स्वत्व खो बैठे थे। इसका परिणाम यह हुआ कि आज भी हमारे घरों में उसी ब्रितानी शिक्षा नीति का प्रभाव दिखाई दे रहा है।’’

उन्होंने कहा कि विकसित भारत की परिकल्पना को साकार रूप देने के लिए नागरिकों को स्वदेशी वस्तुओं का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए।

भाषा

हर्ष रवि कांत