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इंदौर, 19 मई (भाषा) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा धार के भोजशाला परिसर को वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर घोषित किए जाने के बाद मशहूर कोहिनूर हीरे और ब्रिटेन में मौजूद अन्य भारतीय धरोहरों की तरह वाग्देवी की प्रतिमा को भी वापस लाने की मांग तेज हो गई है।
अदालत के इस फैसले के बाद हिंदू समुदाय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संरक्षित मध्यकालीन परिसर में वाग्देवी की प्रतिमा की प्रतिकृति स्थापित करके पूजा-अर्चना शुरू कर दी है।
हालांकि, उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ में जनहित याचिका दायर करके मुकदमा जीतने वाले हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ता लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मूल प्रतिमा को भारत वापस लाकर भोजशाला में पुनर्स्थापित करने की मांग पर जोर दे रहे हैं।
हिंदू पक्ष की याचिकाओं में वाग्देवी की प्रतिमा भारत वापस लाने और उसे भोजशाला परिसर के भीतर फिर से स्थापित करने की गुहार भी शामिल थी। इस पर अदालत ने 15 मई के फैसले में कहा था कि याचिकाकर्ताओं ने भारत सरकार के समक्ष पहले ही इस बारे में कई अभ्यावेदन प्रस्तुत किए हैं और सरकार इन पर विचार कर सकती है।
याचिकाकर्ताओं में शामिल कुलदीप तिवारी ने मंगलवार को ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि अदालत की इस टिप्पणी का हवाला देते हुए उन्होंने केंद्र, एएसआई और राज्य सरकार को नये सिरे से अभ्यावेदन भेजकर मांग की है कि वाग्देवी की प्रतिमा को लंदन से धार लाकर भोजशाला में फिर से स्थापित किया जाए। उन्होंने कहा कि भारत की गुलामी के दौर में इस प्रतिमा को अंग्रेज लंदन ले गए थे।
तिवारी ने कहा, ‘‘अब कोहिनूर की तरह वाग्देवी प्रतिमा की वापसी का मुद्दा भी जोर पकड़ रहा है, लेकिन हमारे लिए यह प्रतिमा कोहिनूर से अधिक महत्वपूर्ण है। यह प्रतिमा हमारी आस्था और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है।’
उन्होंने कहा कि यदि केंद्र सरकार ‘इच्छाशक्ति’ दिखाते हुए कूटनीतिक कदम उठाए, तो इस प्रतिमा को ब्रिटेन से वापस लाना कोई कठिन काम नहीं है क्योंकि अब उच्च न्यायालय भोजशाला को वाग्देवी मंदिर घोषित कर चुका है।
तिवारी ने कहा, ‘‘दुनिया के कई देशों से भारतीय मूर्तियां और ऐतिहासिक धरोहरें पहले भी वापस लाई जा चुकी हैं।’’
उन्होंने कहा कि फिलहाल भोजशाला परिसर में वाग्देवी की प्रतिमा की प्रतिकृति प्रतीकात्मक रूप से स्थापित की गई है, लेकिन हिंदू पक्ष की मांग मूल प्रतिमा की वापसी की है।
सामाजिक संगठन ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ के प्रदेश उपाध्यक्ष और मामले के एक अन्य याचिकाककर्ता आशीष गोयल ने कहा, ‘‘हमने भी केंद्र सरकार से मांग की है कि मां वाग्देवी की प्रतिमा ब्रिटिश म्यूजियम से वापस लाकर भोजशाला में फिर से स्थापित की जाए।’’
गोयल ने कहा कि भोजशाला परिसर में वर्ष 2024 के दौरान एएसआई के सर्वेक्षण में मिलीं 94 मूर्तियों को भी इस स्मारक में ससम्मान स्थापित किया जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि धार के पास स्थित मांडू के 56 महल संग्रहालय और धार किले के संग्रहालय में रखी कुबेर, अर्धनारीश्वर और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों को भी भोजशाला में स्थापित किया जाए।
हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय में दावा किया था कि भोजशाला मूलत: परमार वंश के राजा भोज द्वारा वर्ष 1034 में स्थापित सरस्वती मंदिर है जिसे मालवा क्षेत्र पर अलाउद्दीन खिलजी की फौज के आक्रमण के दौरान 1305 में ढहा दिया गया था। संगठन का यह भी दावा था कि विवादित परिसर में मस्जिद निर्माण के लिए मंदिर के अवशेषों का पुनः उपयोग किया गया।
हिंदू समुदाय द्वारा मां वाग्देवी की प्रतिमा को ब्रिटिश म्यूजियम से वापस लाकर भोजशाला में पुनर्स्थापित करने की मांग गुजरे बरसों में की जाती रही है और सरकार की ओर से इस सिलसिले में समुदाय को आश्वासन भी दिए जाते रहे हैं। इस प्रतिमा को लेकर जैन समुदाय की ओर से भी दावे किए जाते रहे हैं।
दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता सलेकचंद जैन ने भोजशाला मामले में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करके इस परिसर में मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल होने का दावा किया था। उन्होंने कहा था कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी जिस मूर्ति को हिंदू समुदाय भोजशाला में सदियों पहले स्थापित वाग्देवी की प्रतिमा बता रहा है, वह असल में जैन यक्षिणी अम्बिका की मूर्ति है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने जैन की याचिका खारिज कर दी थी।
उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने 15 मई को अपने फैसले में भोजशाला परिसर की धार्मिक प्रकृति वाग्देवी (सरस्वती) मंदिर के रूप में निर्धारित की थी।
अदालत ने एएसआई के सात अप्रैल 2003 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया था जिसमें मुस्लिमों को हर शुक्रवार इस परिसर में नमाज अदा करने की इजाजत दी गई थी। इस आदेश में हिंदुओं को केवल मंगलवार को स्मारक में पूजा-अर्चना की अनुमति दी गई थी।
भाषा हर्ष
मनीषा अमित
अमित