इंदौर (मध्यप्रदेश), 13 फरवरी (भाषा) इंदौर के एक इंजीनियरिंग महाविद्यालय ने घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण एवं जैव विविधता को बढ़ावा देने के लिए अनूठी पहल की है।
देश के सबसे स्वच्छ शहर के रेसकोर्स रोड पर स्थित श्री जी एस विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (एसजीएसआईटीएस) ने अपने परिसर की एक एकड़ जमीन पर जापान की मियावाकी पद्धति से महज दो साल के भीतर नगर वन विकसित किया है।
रीयल एस्टेट क्षेत्र के जानकारों ने बताया कि शहर के सबसे महंगे इलाकों में शामिल रेसकोर्स रोड की इस एक एकड़ जमीन का मौजूदा बाजार मूल्य 100 करोड़ रुपये के आस-पास है।
एसजीएसआईटीएस के परिसर में विकसित मियावाकी वन को शुक्रवार को एक समारोह में लोकार्पित किया गया। मियावाकी जंगल के दो हिस्सों को ‘कृष्ण तरुवन’ और ‘चंदन निकुंज’ नाम दिए गए हैं।
एसजीएसआईटीएस, सरकारी सहायताप्राप्त स्वायत्त संस्थान है। संस्थान के निदेशक नीतेश पुरोहित ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया,‘‘हमने 30 एकड़ में फैले अपने परिसर की एक एकड़ जमीन पर दो साल पहले मियावाकी पद्धति से 65 प्रजातियों के 8,000 से ज्यादा पौधे लगाए थे। इनमें 25 संकटग्रस्त प्रजातियों के पौधे शामिल हैं।’’
उन्होंने बताया कि उचित देखभाल के कारण इनमें से 90 प्रतिशत पौधे पनप गए जिनमें से कई अब 15 से 20 फुट ऊंचे पेड़ बन चुके हैं।
पुरोहित ने बताया कि महाविद्यालय परिसर में टपक सिंचाई पद्धति से मियावाकी वन विकसित किया गया और इसमें केवल जैविक खाद का इस्तेमाल किया गया। निदेशक ने कहा कि इस वन के जरिये महाविद्यालय परिसर के आस-पास की घनी बसाहट में लोगों को शुद्ध ऑक्सीजन मिल सकेगी।
उन्होंने बताया कि मियावाकी वन विकसित करने में करीब 20 लाख रुपये की लागत आई, जबकि इसके सालाना रख-रखाव पर तीन लाख रुपये खर्च किए जाते हैं।
एसजीएसआईटीएस के अधिकारियों ने बताया कि इस नगर वन को विकसित करने के लिए मियावाकी पद्धति से 24 गुणा 27 इंच के हर हिस्से में अलग-अलग तरह के चार पौधे लगाए गए थे।
उन्होंने बताया कि वन विकसित करने के लिए एचडीएफसी बैंक ने कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) के तहत एसजीएसआईटीएस को करीब 17 लाख रुपये दिए थे।
जापान की मियावाकी पद्धति, वनस्पतिशास्त्री डॉ. अकीरा मियावाकी की 1970 के दशक में विकसित पौधारोपण तकनीक है। इस तकनीक के जरिये छोटे आकार के शहरी भूखंडों पर 10 गुना तेजी से, 30 गुना अधिक घने और जैव विविधता से भरपूर वन विकसित किए जा सकते हैं।
भाषा हर्ष अमित रंजन
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