जानिए विजयराघवगढ़ के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड, क्या कहता है मूड मीटर

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जानिए विजयराघवगढ़ के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड, क्या कहता है मूड मीटर

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  • Publish Date - June 20, 2018 / 01:04 PM IST,
    Updated On - November 29, 2022 / 08:02 PM IST

विधायक जी का रिपोर्ट कार्ड में आज हम बात कर रहे हैं, मध्य प्रदेश के कटनी जिले में आने वाली विजयराघवगढ़ की। यह विधानसभा सीट मध्यप्रदेश की बेहद खास सीटों में से एक है। खास इसलिए क्योंकि यहां के विधायक संजय पाठक शिवराज सरकार में मंत्री हैं। राज्य सरकार में सूक्ष्म एवं लघु उद्योग मंत्री होने के बावजूद विजयराघवगढ़ विधानसभा में बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा है। वहीं आज भी यहां के लोग शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों से महरूम हैं। जाहिर है आगामी चुनाव में जनता उनसे पिछले कार्यकाल का हिसाब जरूर मांगेगी।

पिछले चुनाव में विजयराघवगढ़ की जनता ने संजय पाठक पर अपना भरोसा जताया था, लेकिन आज वही जनता अपने विधायक से काफी नाराज है। महंगी गाड़ियों और हेलिकाप्टर से चुनावी दौरा करने वाले संजय पाठक की पहचान एक तेज तर्रार और दबंग नेता के रूप में रही है। लेकिन जिस जनता ने पहले उनके पिता पर, फिर उनपर अपना विश्वास दिखाया, अब वो टूटता हुआ दिखाई दे रहा है। यहां की जनता आज भी पानी और दूसरी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही है। हालांकि बीजेपी विधायक को आज भी अपनी जनता पर पूरा भरोसा है।

विधानसभा क्षेत्र के विकास को लेकर बीजेपी विधायक लाख दावा करें कि सब कुछ ठीक है। लेकिन विजयराघवगढ़ में बेरोजगारी साल दर साल बढ़ती जा रही है। इलाके में कई सीमेंट फैक्ट्रियां हैं लेकिन वहां भी स्थानीय युवाओं को मौका नहीं मिलता। जिसे लेकर युवा वर्ग में नाराजगी साफ देखी जा सकती है। वहीं,  स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में भी ये इलाका काफी पिछड़ा है। ऐसे में कांग्रेस भी इन मुद्दों को लेकर बीजेपी विधायक को घेरने में जुट गई है।

हालांकि अपने ऊपर लगे आरोपों पर बीजेपी विधायक ज्यादा चिंतित नजर नहीं आते। लेकिन सफाई देते हुए ये जरूर कहते हैं कि बीजेपी में आने के बाद पार्टी ने उन पर जिम्मेदारी कुछ ज्यादा ही दे रखी है। जिसके चलते वो क्षेत्र में कम समय दे पाए। तीन बार से विधायक संजय पाठक के लिए चौथी बार चुनाव जीतना इतना आसान नहीं रहेगा, बेरोजगारी को लेकर युवाओँ की नाराजगी उनके खिलाफ जा सकती है। वहीं, उनपर क्षेत्र में विकास करने के बजाय खुद के बिजनेस को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है। जाहिर है इन मुद्दों को लेकर विपक्ष के साथ पार्टी के अंदर भी पुराने नेताओं के निशाने पर हैं संजय पाठक।

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सियासी समीकरण 

अगर क्षेत्र के सियासी समीकरणों की बात की जाए तो विजयराघवगढ़ कांग्रेस की परंपरागत सीट रही है। आजादी के बाद से हुए अब तक 15 चुनावों में बीजेपी यहां केवल तीन बार और जनता पार्टी ने एक बार जीत हासिल की है। 1993 से लेकर 2003 में सत्तापरिवर्तन की लहर को छोड़ दिया जाय तो मंत्री संजय पाठक के परिवार का ही कब्जा रहा है। 2014 में हुए उप चुनाव में संजय पाठक ने बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीता। आने वाले चुनाव में भी विजयराघवगढ़ की राजनीति में कई उतार चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं।

धार्मिक आयोजनों के बहाने ही सही, बीजेपी विधायक संजय पाठक चुनाव से पहले जनता के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगे हैं। शायद उन्हें भी पता है कि अगर वक्त रहते लोगों की नाराजगी दूर नहीं की गई तो, उनका ये गुस्सा आगामी विधानसभा चुनाव में उनके खिलाफ भी जा सकता है।

वैसे तो अब तक हुए 15 विधानसभा चुनावों में यहां की जनता ने 11 बार कांग्रेस के प्रत्याशी पर अपना भरोसा जताया है। लेकिन संजय पाठक के बीजेपी में शामिल होने के बाद यहां बीजेपी मजबूत स्थिति में लग रही है। वैसे सीट के सियासी इतिहास की बात की जाए तो, 1951 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लक्ष्मीशंकर ने जीत हासिल की थी। उसके बाद 1957 में कांग्रेस के कुंजीलाल खूबचंद  यहां से चुनाव जीते। 1962 से लेकर 1972 तक सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा। लेकिन 1977 में जनता पार्टी की लहर में कांग्रेस को पहली बार हार का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी की टिकट पर लक्ष्मीचंद बांझल यहां से चुनाव जीते। 1980 में कांग्रेस ने ब्राह्मण कार्ड खेलते हुए आर के शर्मा को टिकट दिया। जिन्होंने चुनाव जीतकर सीट को कांग्रेस के हिस्से में डाल दिया। इसके बाद 1985 और 1990 में बीजेपी के लाल राजेंद्र सिंह बघेल ने यहां बाजी मारी। मगर 1993 में अर्जुन सिंह के खेमे से सत्येंद्र पाठक ने चुनाव लड़ा और दस साल विधायक रहे। लेकिन 2003 में सत्येंद्र पाठक मंत्री रहते हुए चुनाव हार गए। उन्हें बीजेपी के ध्रुवप्रताप सिंह ने शिकस्त दी। 2008 में संजय पाठक ने अपने पिता की हार का बदला लेते हुए बीजेपी से इस सीट को झटक लिया। 2013 में कांग्रेस से चुनाव जीतने के बाद 2014 में लोकसभा का टिकट न मिलने से नाराज होकर संजय पाठक ने बीजेपी का दामन थाम लिया और 2014 में हुए उप चुनाव में बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीते। जिसका इनाम उन्हें प्रदेश सरकार में मंत्री पद के तौर पर मिला। 

2 लाख 1 हजार 71 मतदाता वाले इस सीट पर जाति समीकरण भी काफी अहम रहा है। एसटी वर्ग और ब्राह्मण मतदाता यहां प्रत्याशियों का किस्तम तय करते आए हैं। यही वजह है की कांग्रेस और बीजेपी यहां ब्राह्मण चेहरे पर ही दांव लगाती हैं। अब चुनाव नजदीक है तो दोनों दलों ने जातिगत समीकरण साधने के लिए गुणाभाग लगाना भी शुरू कर दिया है। कांग्रेस जहां संजय पाठक की छवि को जनता के सेवक की बजाय उधोगपति और बाहुबली के रूप में प्रचारित कर रही है। वहीं, संजय पाठक क्षेत्र में जनता के बीच धार्मिक आयोजन कराकर पैठ को बनाये रखना चाहते हैं।

संजय पाठक का कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल होने के बाद विजयराघवगढ़ के सियासी फिजाओं में काफी बदलाव आया है। कांग्रेस जहां अब तक संजय पाठक का विकल्प खोज पाने में नाकाम रही है। वहीं, बीजेपी के पुराने नेता खुद की अनदेखी से नाराज हैं। ऐसे में कयास लगाया जा रहा है कि कांग्रेस बीजेपी के नाराज नेताओं में से किसी एक को टिकट दे सकती है। वहीं, बीजेपी से मौजूदा विधायक संजय पाठक को टिकट मिलना लगभग तय माना जा रहा है।

संजय पाठक को सियासत विरासत में मिली है। संजय पाठक के पिता सत्येंद्र पाठक भी विजयराघवगढ़ से दो बार विधायक रहे चुके हैं। जबकि मां निर्मला पाठक भी कटनी नगर निगम की महापौर रह चुकी हैं। यानी विजयराघगढ़ सीट को कांग्रेस और बीजेपी के प्रभाव के बजाय पाठक परिवार के प्रभाव की सीट कहा जाय तो गलत नहीं होगा। आगामी विधानसभा में विधायक संजय पाठक एक बार फिर विजयराघवगढ़ से ताल ठोंकने के लिए तैयार है। लेकिन इस बार उनके लिए चुनौती कांग्रेस से कहीं ज्यादा घर में ही है। समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष पद्मा शुक्ला फिर से अपनी दावेदारी जता रही है। पद्मा शुक्ला का मानना है कि पार्टी इस बार उनके कामों को देखते हुए उन्हें जरूर मौका देगी। 

पद्मा शुक्ला के अलावा 2003 में सत्येंद्र पाठक को चुनाव हराने वाले ध्रुप प्रताप सिंह भी मौजूदा विधायक को चुनौती दे रहे हैं। वहीं कांग्रेस के संभावित उम्मीदवारों की बात की जाए तो, जिला पंचायत सदस्य गुड्डू दीक्षित को कांग्रेस टिकट दे सकती है। वहीं, जातिगत समीकरण के आधार पर नीरज सिंह बघेल भी विजयराघवगढ़ से टिकट की मांग कर रहे हैं।

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बीजेपी अगर संजय पाठक को टिकट देती है। तो कांग्रेस पद्मा शुक्ला, गुड़्डू दीक्षित और ध्रुव प्रताप सिंह पर अपना दांव लगा सकती है। इनमें से कुछ नेता कांग्रेस के बड़े नेताओं के संपर्क में भी हैं। यानी इस बार बीजेपी गुटबाजी की शिकार हो सकती है। ऐसा नहीं है कि संजय पाठक इन हालातों से वाकिफ नहीं हैं। बावजूद इसके उन्हें अपनी क्षेत्र की जनता पर पूरा भरोसा है।

संजय पाठक जब तक  कांग्रेस में थे, तब तक कांग्रेस ने उनके विकल्प को लेकर कभी सोचा नहीं। अब जब वो बीजेपी में हैं, तो वहां भी वो पुराने बीजेपी नेताओं पर भारी पड़ रहे है। लेकिन ऐन चुनाव से पहले विजयराघवगढ़ में बीजेपी के अंदर ही टिकट के दावेदारों के बीच मचे घमासान और पार्टी के अंदर की गुटबाजी ने यहां के चुनाव को रोचक बना दिया है।

मंत्री संजय पाठक का इस बार भी विजयराघवगढ़ से चुनाव लड़ना लगभग तय है। कैसी है संजय पाठक की चुनावी तैयारियां और अपने ऊपर लगे आरोपों पर उनका क्या कहना है। जानने के लिए ऊपर दिए वीडियो को देखें।

वेब डेस्क, IBC24

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