अमरावती: High Court on Alimony: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने दोहराया है कि अलग रह रही पत्नी को दिया जाने वाला गुजारा भत्ता कोई खैरात नहीं, बल्कि उसका हक है, जिसे लागू करना न्याय, निष्पक्षता और अंतरआत्मा की शांति एवं संतुष्टि को बनाए रखने के लिए जरूरी है।
High Court on Alimony: न्यायमूर्ति वाई लक्ष्मण राव ने पारिवारिक न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें चिन्नम किरणमयी स्माइली को हर महीने 7,500 रुपये और उसके नाबालिग बेटे को 5,000 रुपये का गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था। उन्होंने कहा कि भारत में गुजारा भत्ता संबंधी न्यायशास्त्र न्यायपालिका के संकल्प का प्रमाण है। न्यायमूर्ति राव ने नौ फरवरी को पारित आदेश में कहा कि यह संकल्प सुनिश्चित करता है कि कोई भी पत्नी, बच्चा या आश्रित माता-पिता उन लोगों की उपेक्षा के कारण गरीबी में जीवन यापन करने के लिए मजबूर न हों, जो कानूनी रूप से उनका भरण-पोषण करने के लिए बाध्य हैं।
उन्होंने कहा, “अदालतों ने लगातार दोहराया है कि गुजारा भत्ता कोई खैरात नहीं, बल्कि एक अधिकार है और निष्पक्षता, न्याय तथा अंतरआत्मा की शांति एवं संतुष्टि को बनाए रखने के लिए इसे लागू करना जरूरी है। इस तरह, भारत में गुजारा भत्ता संबंधी न्यायशास्त्र न्यायपालिका के इस संकल्प का प्रमाण है कि कोई भी पत्नी, बच्चा या आश्रित माता-पिता उन लोगों की उपेक्षा के कारण गरीबी में जीवन यापन करने के लिए मजबूर न हो जाएं, जिन पर कानूनी रूप से उनका भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी है।” चिन्नन किशोर कुमार ने पारिवारिक न्यायालय के तीन मार्च 2018 के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। उसने दलील दी थी कि अलग रह रही पत्नी को गुजारा भत्ता देने का आदेश ज्यादती, मनमाना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाला है।