वैश्विक सहभागिता अपरिहार्य है, लेकिन बगैर दबाव के होनी चाहिए, यह शुल्क-आधारित नहीं हो : भागवत

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वैश्विक सहभागिता अपरिहार्य है, लेकिन बगैर दबाव के होनी चाहिए, यह शुल्क-आधारित नहीं हो : भागवत

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  • Publish Date - February 7, 2026 / 10:32 PM IST,
    Updated On - February 7, 2026 / 10:32 PM IST

(तस्वीरों के साथ)

मुंबई, सात फरवरी (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को कहा कि वैश्विक सहभागिता अपरिहार्य है, लेकिन यह किसी के दबाव में आए बिना होनी चाहिए और इसे शुल्क-आधारित नहीं होना चाहिए।

उन्होंने लोगों से यह ध्यान में रखकर उत्पाद खरीदने का आग्रह किया कि यह देश में रोजगार के अवसरों को कैसे बढ़ावा दे सकता है। भागवत ने बताया कि कई भारतीय उत्पाद विदेश में निर्मित उत्पादों से बेहतर हैं।

भागवत यहां ‘संघ की यात्रा के 100 साल’ नामक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘‘लोगों को यह सोचना चाहिए कि उनकी पसंद देश में रोजगार को कैसे बढ़ावा देते हैं। जहां भी आवश्यक हो, वैश्विक सहभागिता भारत के हितों और पर्यावरण के अनुकूल होनी चाहिए और शुल्क-आधारित नहीं होनी चाहिए।’’

आरएसएस प्रमुख ने कहा, ‘‘कई विदेशी वस्तुएं हैं, जिनका उपयोग हम अपने दैनिक जीवन में टाल सकते हैं। वहीं, कई भारतीय उत्पाद हैं, जो विदेश में बने उत्पादों से बेहतर हैं। हमें सामान खरीदते समय इस बात का ध्यान रखना होगा कि इससे हमारे देश में रोजगार किस तरह बढ़ेगा। वैश्विक सहभागिता अपरिहार्य है, लेकिन यह किसी के दबाव में आए बिना होनी चाहिए और यह शुल्क-आधारित नहीं होनी चाहिए।’’

उनका यह बयान कांग्रेस नेता राहुल गांधी के उस आरोप के कुछ दिनों बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि मोदी सरकार ने व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए अमेरिका के दबाव के आगे घुटने टेक दिए और इस समझौते के माध्यम से भारतीय किसानों की कड़ी मेहनत को ‘बेच’ दिया।

भागवत ने कहा कि आरएसएस का उद्देश्य एकता के माध्यम से समाज को सशक्त बनाकर राष्ट्र को मजबूत करना है। उन्होंने संगठन की वर्तमान स्थिति का वर्णन करते हुए कहा, ‘‘अगर आपके पास कोई विषय है, तो हमारे पास एक टीम है। अगर आपके पास एक टीम है, तो हमारे पास एक विषय है।’’

उन्होंने दैनिक जीवन के लिए पांच प्रमुख क्षेत्रों पर प्रकाश डाला – सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण संरक्षण, आत्म-जागरूकता, पारिवारिक मूल्य और संवैधानिक नागरिक कर्तव्य।

उन्होंने कहा, ‘‘यह पंच परिवर्तन स्वयंसेवकों से शुरू होना चाहिए और धीरे-धीरे पूरे समाज में प्रसारित होना चाहिए।’’

भाषा संतोष दिलीप

दिलीप