nitesh rane/ image source: ani x handle
Nitest Rane on Corporate Jihad: मुंबई: महाराष्ट्र के मंत्री और भाजपा नेता नितेश राणे ने एक बार फिर अपने विवादित बयान को लेकर सुर्खियां बटोरी हैं। उन्होंने राज्य में कथित तौर पर ‘कॉर्पोरेट जिहाद’ के उभरने का दावा करते हुए कॉर्पोरेट जगत में धार्मिक प्रतीकों और ड्रेस कोड को लेकर सवाल उठाए हैं। मुंबई में मीडिया से बातचीत के दौरान राणे ने कहा कि कॉर्पोरेट सेक्टर में हिजाब और बुर्का पहनने की अनुमति दी जाती है, लेकिन तिलक जैसे हिंदू धार्मिक प्रतीकों को स्वीकार नहीं किया जाता।
#WATCH | Mumbai: On corporate dress code row, Maharashtra Minister Nitesh Rane says, “… We too believe in God. But why should corporate sectors permit the hijab and burqa, while the tilak is not allowed? If one religion’s practices are restricted, then others should be treated… pic.twitter.com/LNK3mWDLvZ
— ANI (@ANI) April 22, 2026
उन्होंने इस स्थिति को असमान और भेदभावपूर्ण बताते हुए कहा कि अगर एक धर्म की प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाया जाता है, तो अन्य धर्मों के साथ भी समान व्यवहार होना चाहिए। राणे ने यह भी कहा कि स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब और बुर्का को लेकर पहले से ही बहस चल रही है, और इसी तरह कॉर्पोरेट जगत में भी समान नियम लागू किए जाने चाहिए। उनके अनुसार, किसी एक धर्म को विशेष छूट देना और दूसरे को प्रतिबंधित करना निष्पक्षता के सिद्धांत के खिलाफ है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कॉर्पोरेट संस्थानों को एक समान ड्रेस कोड नीति अपनानी चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार का धार्मिक भेदभाव न हो और सभी कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित किया जा सके।
इससे पहले भी नितेश राणे ने नासिक में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) से जुड़े एक मामले का हवाला देते हुए गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया था कि कुछ स्थानों पर नौकरियों का इस्तेमाल धर्मांतरण के साधन के रूप में किया जा रहा है। राणे ने कहा कि यदि व्यापार और कॉर्पोरेट कार्यालयों जैसे मंचों का उपयोग किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है, तो इसका कड़ा जवाब देने का समय आ गया है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी घटनाओं के चलते हिंदू समुदाय में यह भावना बढ़ रही है कि आर्थिक लेन-देन और रोजगार के अवसर अपने ही समुदाय तक सीमित किए जाएं।
राणे ने अपने बयान में यह भी चेतावनी दी कि भविष्य में कंपनियां ऐसी कथित गतिविधियों को रोकने के लिए केवल हिंदुओं को नौकरी देने जैसी नीतियां अपना सकती हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य समाज को बांटना नहीं है, बल्कि वे जमीनी अनुभवों और शिकायतों के आधार पर अपनी बात रख रहे हैं। उनके अनुसार, यदि रोजगार का इस्तेमाल धर्मांतरण या किसी विशेष एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है, तो इसे केवल आजीविका का साधन नहीं बल्कि एक गंभीर सामाजिक मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके इन बयानों के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में एक नई बहस छिड़ गई है।
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