फिल्म ‘रंग दे बसंती’ आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी 20 साल पहले थी: निदेशक मेहरा

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फिल्म ‘रंग दे बसंती’ आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी 20 साल पहले थी: निदेशक मेहरा

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  • Publish Date - January 23, 2026 / 08:27 PM IST,
    Updated On - January 23, 2026 / 08:27 PM IST

मुंबई, 23 जनवरी (भाषा) फिल्मकार राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने ‘रंग दे बसंती’ के 20 वर्ष पूरे होने पर कहा कि यह फिल्म आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी 20 साल पहले थी।

मेहरा ने कहा कि आजादी की लड़ाई के दौरान एक ऐसा दौर भी आया था, जब युवाओं को कलम छोड़कर बंदूक उठानी पड़ी। इसी सवाल ने उन्हें झकझोरा। इसके साथ ही भगत सिंह का जेल से लिखा वह विचार कि आजादी का असली अर्थ इंसान द्वारा इंसान के शोषण से मुक्ति है, ने फिल्म ‘रंग दे बसंती’ को बनाने की प्रेरणा दी।

उन्होंने कहा कि कवि साहिर लुधियानवी भी इस फिल्म के लिए एक मार्गदर्शक थे।

यह फिल्म वर्ष 2006 में गणतंत्र दिवस के दिन सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी।

मेहरा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘साहिर की कविता, ‘बहुत दिनों से है ये मशग़ला सियासत का, की जब जवां हों बच्चे तो कत्ल हो जाएं…’ यहां दीवार पर चिपकी हुई थी। मैंने हर दिन उसे देखकर फिल्म लिखी।’

उन्होंने साहिर की मशहूर पंक्तियां उद्धृत कीं जिनका मोटे तौर पर अनुवाद है, ‘सत्ता में बैठे लोगों का यह पुराना शौक रहा है कि जब हमारे बच्चे बड़े हो जाते हैं, तो उनकी बलि दे दी जाती है।’

यह फिल्म कॉलेज के चार छात्रों की कहानी है, जो भगत सिंह पर बन रहे एक वृत्तचित्र से जुड़ते हैं। कहानी वर्तमान के युवाओं और भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद व अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान जैसे क्रांतिकारियों के संघर्ष के बीच समानांतर रूप से आगे बढ़ती है।

मेहरा के मुताबिक, रंग दे बसंती युवाओं से देश निर्माण की जिम्मेदारी समझने और निभाने की अपील थी।

फिल्म में आमिर ख़ान, कुणाल कपूर, सिद्धार्थ, आर. माधवन और वहीदा रहमान ने अभिनय किया हैं।

भाषा

राखी नरेश

नरेश