Home » Religion » Banke Bihari Mandir: Why is the Mangala Aarti of Banke Bihari performed only on Janmashtami? Why is there a 'no-entry' rule for birds here as soon as evening falls?
Banke Bihari Mandir: केवल जन्माष्टमी पर ही क्यों होती है बांके बिहारी की मंगला आरती? क्यों यहाँ शाम ढ़लते ही परिंदों की भी होती है नो-एंट्री?
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वृंदावन का श्री बांके बिहारी मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं के लिए दुनिया भर में मशहूर है। क्या आप जानते हैं कि बांके बिहारी जी की मंगला आरती साल में सिर्फ एक ही बार क्यों होती है? क्यों शाम ढ़लते ही यहाँ परिंदों की एंट्री भी बंद हो जाती है? जान लें रहस्यमय सच...
Banke Bihari Mandir: वृंदावन का “श्री बांके बिहारी मंदिर”अपनी अनोखी परंपराओं के लिए दुनिया भर में मशहूर है। जहां बाकी मंदिरों में रोज सुबह सूरज उगने से पहले मंगला आरती होती है, वहीं बांके बिहारी जी के मंदिर में ऐसा नहीं किया जाता। यहाँ साल में सिर्फ एक ही दिन, यानी जन्माष्टमी पर मंगला आरती होती है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि मंगला आरती असल में क्या है और यह बाकी आरतियों से अलग क्यों मानी जाती है? चलिए जानते हैं इसका महत्व..
‘मंगला’ का अर्थ होता है शुभ या अच्छा होना। हिन्दू शास्त्रों में मंगला आरती का सीधा अर्थ है सुबह-सुबह भगवान को जगाना और दिन की पहली सेवा/पूजा करना। यह आरती रोज़ सूर्योदय से ठीक पहले (ब्रह्म मुहूर्त) में की जाती है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि भगवान का पूरा दिन शुभ हो और उनके सबसे पहले दर्शन कर भक्त पुण्य प्राप्त कर सकें।
बांके बिहारी की मंगला आरती साल में सिर्फ एक बार, जन्माष्टमी पर ही क्यों?
क्या आप जानते हैं कि बांके बिहारी मंदिर में रोज़ सुबह मंगला आरती क्यों नहीं होती? इसके पीछे निधिवन की रात्रिकालीन रासलीला की मान्यता जुड़ी है। ब्रजवासियों की अटूट आस्था है कि रोज़ रात को शयन आरती के बाद मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं, तब ठाकुर बांके बिहारी जी सीधे निधिवन चले जाते हैं।
वहाँ रातभर राधा रानी और सखियों संग रासलीला और नृत्य के बाद ठाकुर जी बहुत थक जाते हैं और भोर के समय मंदिर लौटकर वे विश्राम करते हैं। चूँकि बांके बिहारी मंदिर में ठाकुर जी की सेवा एक बाल स्वरुप में की जाती है, इसलिए ब्रजवासियों का यह वात्सल्य भाव है कि किसी सोते हुए बच्चे की नींद में खलल न पड़े, इसी लाड-प्यार के कारण उन्हें जल्दी जगाने की परंपरा नहीं है।
फिर जन्माष्टमी की रात ही पट क्यों खुलते हैं और रात्रि 2 बजे के दर्शन की क्या है परंपरा?
“श्रीकृष्ण जन्माष्टमी“ यानी हमारे प्यारे कान्हा का जन्मदिन। शास्त्रानुसार, द्वापर युग में इसी दिन आधी रात को ठीक 12 बजे श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था।
रात के 12 बजते ही जन्म के तुरंत बाद, गर्भगृह के पट बंद करके ठाकुर जी का पंचामृत (दूध, दही, शहद, घी और गंगाजल) से महाअभिषेक किया जाता है।
इसके बाद कान्हा को पीले रंग के वस्त्र और स्वर्ण-हीरे के आभूषण पहनकर उन्हें चाँदी के विशेष पालने (झूले) में बिठाया जाता है।
चूँकि जन्माष्टमी की रात कान्हा का नया जन्म होता है इसलिए उस रात ठाकुर जी निधिवन रास रचाने नहीं जाते। श्रृंगार पूरा होते ही रात्रि लगभग 2:00 से 3:00 बजे के बीच साल की एकमात्र मंगला आरती होती है और भक्तों के लिए कपाट खोल दिए जाते हैं।
कान्हा और निधिवन का रिश्ता इतना गहरा है कि इसे शब्दों में समेटना मुश्किल है। यही वो पवित्र जगह है जहाँ से हमारे बांके बिहारी जी प्रकट हुए थे। कहते हैं, तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास जी यहाँ बैठकर जब कृष्ण का भजन गाते थे, तो प्रभु खुद को रोक नहीं पाते थे। हरिदास जी के इसी प्यार और संगीत के खिंचे चले आए राधा-कृष्ण यहाँ विशाखा कुंड से मूर्ति रूप में प्रकट हुए।
निधिवन के बारे में एक और हैरान करने वाली बात यह है कि यहाँ के जुड़े हुए तुलसी के पेड़ असल में गोपियाँ हैं, जो रात होते ही इंसानी रूप में आकर रास रचाती हैं। यहाँ बने ‘रंग महल’ में रोज़ रात को राधा-कृष्ण आराम करने आते हैं। इसी दैवीय चमत्कार की वजह से शाम की आरती के बाद इंसान तो क्या, कोई पशु-पक्षी भी इस वन में पैर नहीं रखता।
Disclaimer:- उपरोक्त लेख में उल्लेखित सभी जानकारियाँ प्रचलित मान्यताओं और धर्म ग्रंथों पर आधारित है। IBC24.in लेख में उल्लेखित किसी भी जानकारी की प्रामाणिकता का दावा नहीं करता है। हमारा उद्देश्य केवल सूचना पँहुचाना है।
बांके बिहारी मंदिर में रोज़ सुबह मंगला आरती क्यों नहीं की जाती?
मान्यता है कि ठाकुर बांके बिहारी जी रोज़ रात को शयन आरती के बाद निधिवन में श्री राधा रानी और गोपियों संग रास रचाते हैं। रात भर नृत्य करने के कारण वे अत्यधिक थक जाते हैं और भोर के समय मंदिर लौटकर विश्राम करते हैं। चूँकि मंदिर में उनकी सेवा एक छोटे बालक के रूप में होती है, इसलिए उनके विश्राम में खलल न पड़े, इस भाव से रोज़ सुबह मंगला आरती नहीं की जाती।
जन्माष्टमी पर रात 2 बजे होने वाली मंगला आरती का क्या महत्व है?
जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य दिवस (जन्मदिन) है। शास्त्रानुसार कान्हा का जन्म आधी रात 12 बजे हुआ था। जन्म के तुरंत बाद मध्यरात्रि में ठाकुर जी का महाअभिषेक और विशेष शृंगार होता है। चूँकि इस रात नए जन्मे कान्हा निधिवन रास के लिए नहीं जाते, इसलिए शृंगार पूरा होते ही रात 2 से 3 बजे के बीच वर्ष की एकमात्र मंगला आरती की जाती है।
निधिवन में शाम की आरती के बाद रुकना क्यों वर्जित है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, निधिवन में आज भी रोज़ रात को राधा-कृष्ण दिव्य रास रचाते हैं और वहाँ के पेड़ गोपियाँ बनकर नृत्य करते हैं। इस अलौकिक और गुप्त लीला को देखना इंसानी आँखों और बुद्धि के परे है। जो कोई भी इसे देखने का प्रयास करता है, वह अंधा, गूँगा या मानसिक संतुलन खो बैठता है। इसी कारण शाम के बाद वहाँ इंसानों तो क्या, पशु-पक्षियों के रुकने पर भी पूर्ण प्रतिबंध है।
बांके बिहारी जी का निधिवन से क्या संबंध है?
निधिवन को ही ठाकुर बांके बिहारी जी का प्राकट्य स्थल माना जाता है। स्वामी हरिदास जी की अनन्य भक्ति और मधुर संगीत से प्रसन्न होकर साक्षात् राधा-कृष्ण इसी वन के विशाखा कुंड से बांके बिहारी स्वरूप में प्रकट हुए थे, जिसे बाद में मंदिर में स्थापित किया गया।
क्या जन्माष्टमी के अलावा किसी और दिन बांके बिहारी की मंगला आरती होती है?
नहीं, पूरे वर्ष में केवल और केवल श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर ही बांके बिहारी जी की मंगला आरती की जाती है। साल के बाकी 364 दिन मंदिर में सीधे सुबह शृंगार आरती से ही दर्शन शुरू होते हैं।