विश्व के अनेक देशों के सामने आज सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है—अवैध अप्रवासन (Illegal Immigration), सीमा सुरक्षा और उससे उत्पन्न होने वाले जनसांख्यिकीय परिवर्तन। यह केवल किसी एक देश या महाद्वीप का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता, आर्थिक संसाधनों और सुशासन से जुड़ा वैश्विक प्रश्न है। यूरोप, अमेरिका और एशिया के अनेक देशों ने पिछले दो दशकों में इस चुनौती का सामना किया है।
हाल के वर्षों में स्पेन के उत्तर अफ्रीकी क्षेत्र सेउटा (Ceuta) और मेलिला (Melilla) एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा में रहे हैं। मोरक्को की सीमा से बड़ी संख्या में लोगों द्वारा सामूहिक रूप से सीमा पार करने के प्रयासों ने यह स्पष्ट किया कि यदि किसी देश की सीमाओं पर लगातार दबाव बढ़े और अवैध प्रवेश को समय रहते प्रभावी ढंग से नियंत्रित न किया जाए, तो प्रशासन, कानून-व्यवस्था और स्थानीय संसाधनों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। यही कारण है कि स्पेन और यूरोपीय संघ ने सीमा सुरक्षा, पहचान सत्यापन और प्रवासन नियंत्रण को अपनी प्रमुख नीतिगत प्राथमिकताओं में शामिल किया है। स्पेन का अनुभव यह भी बताता है कि सीमा संकट केवल सीमा सुरक्षा बलों का विषय नहीं होता। इसके प्रभाव शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास, स्थानीय प्रशासन और सामाजिक विश्वास तक पहुँचते हैं। जब किसी क्षेत्र में अचानक बड़ी संख्या में अनियमित प्रवासन होता है, तब स्थानीय संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ना स्वाभाविक है। इसलिए अधिकांश विकसित राष्ट्र अपनी सीमाओं की निगरानी, नागरिक पहचान प्रणाली और आव्रजन कानूनों को लगातार मजबूत करते रहते हैं।
यहाँ एक मूलभूत अंतर समझना आवश्यक है—वैध प्रवासन (Legal Migration) और अवैध अप्रवासन (Illegal Immigration)। किसी भी संप्रभु राष्ट्र को यह अधिकार है कि वह अपने कानूनों के अनुसार विदेशियों को प्रवेश, निवास या नागरिकता प्रदान करे। लेकिन बिना वैध अनुमति या दस्तावेज़ के सीमा पार करना कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए चुनौती माना जाता है। इसलिए इस विषय का मूल प्रश्न किसी व्यक्ति की धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान नहीं, बल्कि कानून का पालन और सीमा प्रबंधन है।
भारत के संदर्भ में भी यह विषय दशकों से सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रहा है। विशेषकर पूर्वी सीमा, नकली दस्तावेज़ों, सीमा प्रबंधन और नागरिक पहचान से जुड़े प्रश्न समय-समय पर संसद, न्यायालयों और सरकारी एजेंसियों के समक्ष उठते रहे हैं। पश्चिम बंगाल और असम जैसे सीमावर्ती राज्यों में अवैध प्रवासन को लेकर लंबे समय से राजनीतिक और प्रशासनिक बहस होती रही है। इस विषय पर विभिन्न राजनीतिक दलों के मत भिन्न रहे हैं, इसलिए किसी भी निष्कर्ष तक पहुँचने से पहले आधिकारिक आँकड़ों, न्यायालयों के निर्णयों और सरकारी दस्तावेज़ों का अध्ययन आवश्यक है।
जनसांख्यिकीय परिवर्तन (Demographic Change) स्वयं में न तो सकारात्मक होता है और न नकारात्मक। यह जन्मदर, मृत्यु दर, शहरीकरण, आर्थिक अवसरों और प्रवासन जैसे अनेक कारणों से होता है। किंतु यदि किसी क्षेत्र में लंबे समय तक बड़े पैमाने पर अनियंत्रित अवैध प्रवासन होता रहे, तो स्थानीय प्रशासन, सार्वजनिक सेवाओं और सामाजिक संतुलन पर उसका प्रभाव पड़ सकता है। यही कारण है कि विश्व के अधिकांश राष्ट्र जनसंख्या के वैज्ञानिक अध्ययन, सीमा प्रबंधन और नागरिक पहचान व्यवस्था को राष्ट्रीय नीति का महत्वपूर्ण भाग मानते हैं।
स्पेन की घटनाएँ हमें यह भी सिखाती हैं कि किसी भी समस्या की अनदेखी लंबे समय तक नहीं की जा सकती। जब तक स्थिति सामान्य रहती है, तब तक उसका वास्तविक स्वरूप स्पष्ट नहीं होता; लेकिन संकट उत्पन्न होने के बाद उसे नियंत्रित करने की आर्थिक, प्रशासनिक और सामाजिक लागत कई गुना बढ़ जाती है। राष्ट्रीय सुरक्षा का मूल सिद्धांत भी यही है कि रोकथाम (Prevention) उपचार (Reaction) से अधिक प्रभावी होती है।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र के लिए यह विषय और भी महत्वपूर्ण है। भारत की हजारों किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ अनेक देशों से जुड़ी हैं। इसलिए आधुनिक तकनीक आधारित सीमा निगरानी, दस्तावेज़ सत्यापन, प्रभावी सीमा प्रबंधन, स्थानीय प्रशासन की क्षमता और नागरिक पंजीकरण प्रणाली को मजबूत करना राष्ट्रीय हित का विषय है। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रत्येक कार्रवाई संविधान, विधि के शासन और मानवाधिकारों के अनुरूप हो।
लोकतंत्र में सरकार का पहला दायित्व अपने नागरिकों की सुरक्षा, कानून का समान अनुपालन और सीमाओं की रक्षा करना है। यदि सीमा सुरक्षा, अवैध प्रवासन और नागरिक पहचान जैसे विषयों को केवल अल्पकालिक राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए, तो समाज में अविश्वास और तनाव बढ़ने की आशंका हो सकती है। दूसरी ओर, यदि इन विषयों पर तथ्य-आधारित, पारदर्शी और दीर्घकालिक नीति बनाई जाए, तो राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता दोनों को सुदृढ़ किया जा सकता है।
आज आवश्यकता भय या वैमनस्य फैलाने की नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक चेतना विकसित करने की है। किसी भी देश की सीमाएँ केवल नक्शे पर खींची गई रेखाएँ नहीं होतीं; वे उसकी संप्रभुता, सुरक्षा, प्रशासनिक क्षमता और भविष्य की स्थिरता का आधार होती हैं। इसलिए सीमा सुरक्षा, नागरिक पहचान, अवैध अप्रवासन और जनसांख्यिकीय परिवर्तन जैसे विषयों पर सार्वजनिक चर्चा प्रमाण, कानून और राष्ट्रीय हित के आधार पर होनी चाहिए।
स्पेन का अनुभव भारत सहित सभी लोकतांत्रिक देशों के लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन-प्रकरण है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय दायित्वों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए प्रभावी सीमा प्रबंधन, निष्पक्ष कानून-प्रवर्तन, पारदर्शी नागरिक पहचान व्यवस्था और समय पर नीति-निर्माण किसी भी राष्ट्र की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए अनिवार्य हैं। इतिहास उन राष्ट्रों को अधिक सुरक्षित पाता है जो चुनौतियों को समय रहते पहचानते हैं, तथ्यों के आधार पर उनका विश्लेषण करते हैं और दूरदर्शी नीतियों के माध्यम से उनका समाधान खोजते हैं।
— कैलाश चन्द्र
( लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
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