शुरुआत में शतरंज को समझने में काफी परेशानी हुई: कार्लसन

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शुरुआत में शतरंज को समझने में काफी परेशानी हुई: कार्लसन

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  • Publish Date - September 16, 2026 / 08:40 PM IST,
    Updated On - September 16, 2026 / 08:40 PM IST

नयी दिल्ली, 16 सितंबर (भाषा) शतरंज इतिहास के महानतम खिलाड़ियों में शामिल नॉर्वे के सुपरस्टार ग्रैंडमास्टर मैग्नस कार्लसन ने कहा है कि बचपन में जब उन्होंने पहली बार शतरंज खेलना शुरू किया था, तब यह खेल उन्हें स्वाभाविक रूप से आसान नहीं लगा था।

उन्होंने बताया कि इस खेल को अपनी पसंद और ताकत बनाने में उन्हें काफी समय लगा।

कार्लसन ने कहा, “मेरे लिए यह कहना थोड़ा मुश्किल है। जब मुझे कम उम्र में शतरंज सिखाया जा रहा था, तब शुरुआत में यह खेल मुझे बहुत आसान नहीं लगा था। इसमें थोड़ा समय लगा और फिर मैंने खुद शतरंज का काफी अध्ययन करना शुरू किया। आखिरकार यह मेरा खेल बन गया।’’

पैंतीस साल के कार्लसन ने हालांकि माना कि कुछ खिलाड़ियों में गणना करने की स्वाभाविक क्षमता दूसरों की तुलना में अधिक होती है। वर्षों के अनुभव ने उन्हें शतरंज की स्थिति को सहज रूप से समझने की क्षमता विकसित करने में मदद की है।

उन्होंने ‘फर्स्टपोस्ट’ को दिये साक्षात्कार में कहा, “मुझे लगता है कि कुछ अन्य खिलाड़ी गणना के मामले में मुझसे ज्यादा तेज हैं। वे शायद मुझसे अधिक किसी तरह की गणितीय प्रतिभा पर निर्भर करते हैं। लेकिन दूसरी ओर वर्षों से शतरंज में किए गए मेरे काम ने खेल को लेकर मेरी स्वाभाविक समझ को बेहद मजबूत बनाया है। इसलिए यह दोनों का मिश्रण है।”

कार्लसन ने पिछले साल नॉर्वे शतरंज में डी. गुकेश के खिलाफ क्लासिकल मुकाबले के दौरान गुस्से में टेबल पर हाथ मारने वाले अपने चर्चित और वायरल पल को भी याद किया। उन्होंने बताया कि यह प्रतिक्रिया उस “गहरी निराशा” का नतीजा थी, जो टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन के बीच उस समय अचानक सामने आई।

उन्होंने ने कहा, ‘‘मैंने कुछ बाजियां जीती थीं और खास तौर पर किसी भी मुकाबले में हार के करीब नहीं पहुंचा था। अगर मैं वह बाजी भी जीत जाता, तो विश्व चैंपियन गुकेश को दो बार हरा चुका होता।’’

कार्लसन ने माना कि टेबल पर हाथ मारने का उनका वीडियो और उससे बना मीम उनके लिए “ गर्व करने वाला पल नहीं था।’’

उन्होंने हालांकि इसे अपनी बेहद आक्रामक और जीत के लिए जुनूनी प्रतिस्पर्धी प्रवृत्ति का नतीजा बताया।

उन्होंने कहा, “उस समय ऐसा लगा जैसे सब कुछ एक साथ आकर मेरे सामने खड़ा हो गया था।”

भाषा आनन्द सुधीर

सुधीर