नई दिल्लीः AI vs Human Jobs Conflict: डिजिटल क्रांति के इस दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सबसे बड़ी तकनीकी शक्ति के रूप में उभरी है। चैटबॉट, ऑटोमेशन सॉफ्टवेयर, रोबोटिक्स और डेटा एनालिटिक्स जैसे उपकरणों ने काम करने के तरीके को तेजी से बदल दिया है। लेकिन इसके साथ ही एक बड़ी चिंता भी सामने आई है कि क्या AI हमारी नौकरियां खत्म कर देगा? सवाल यह भी है कि अगर नौकरी खत्म हो जाएगी तो दुनिया के 800 करोड़ लोग क्या करेंगे?
मीडिया रिपोर्ट्स में ChatGPT के हवाले से बताया गया है कि AI का उद्देश्य इंसानों को पूरी तरह रिप्लेस करना नहीं, बल्कि उनके काम को आसान और तेज बनाना है। इतिहास बताता है कि हर तकनीकी क्रांति के साथ कुछ नौकरियां खत्म हुईं, लेकिन नई नौकरियां भी पैदा हुईं। औद्योगिक क्रांति के समय भी यही डर था। कंप्यूटर के आने पर भी यही आशंका जताई गई थी।
यह सच है कि कई पारंपरिक और दोहराव वाले काम धीरे-धीरे कम हो सकते हैं। ऑटोमेशन और स्मार्ट सॉफ्टवेयर डेटा एंट्री, बेसिक प्रोसेसिंग और रूटीन विश्लेषण जैसे कार्य तेजी से संभाल रहे हैं। लेकिन इसी के साथ नए क्षेत्र उभर रहे हैं।
AI vs Human Jobs Conflict: AI के आने के बाद डेटा साइंस, मशीन लर्निंग, साइबर सिक्योरिटी, AI ट्रेनिंग, रोबोटिक्स और डिजिटल मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञों की मांग लगातार बढ़ रही है। कंपनियां अब ऐसे पेशेवर चाहती हैं जो तकनीक को समझें और उसे बेहतर तरीके से लागू कर सकें। इसके अलावा कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहां इंसानी संवेदनशीलता की जगह मशीन नहीं ले सकती। हेल्थकेयर, शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं, कला और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों में मानवीय जुड़ाव और भावनात्मक समझ की अहमियत बनी रहेगी। इससे साफ है कि भविष्य में नौकरियां खत्म नहीं होंगी, बल्कि उनका चरित्र बदलेगा।
आने वाले समय में वही लोग सल होंगे जो नई तकनीक के साथ खुद को अपडेट करेंगे। डिजिटल लिटरेसी, क्रिटिकल थिंकिंग, क्रिएटिविटी और समस्या सुलझाने की क्षमता बेहद जरूरी होगी। सरकारों और संस्थानों को भी शिक्षा प्रणाली में बदलाव लाकर लोगों को भविष्य की जरूरतों के हिसाब से प्रशिक्षित करना होगा। AI को दुश्मन नहीं, बल्कि एक टूल के रूप में देखने की जरूरत है। हालांकि यह भी सच है कि AI से असमानता बढ़ने का खतरा हो सकता है। अगर तकनीक का लाभ केवल कुछ कंपनियों या देशों तक सीमित रह गया, तो बेरोजगारी और आर्थिक अंतर बढ़ सकता है। इसलिए नीति-निर्माताओं के लिए जरूरी है कि वे AI के विकास के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा, नई नौकरियों के अवसर और रिस्किलिंग प्रोग्राम पर भी ध्यान दें। कुछ विशेषज्ञ यूनिवर्सल बेसिक इनकम जैसे विकल्पों पर भी चर्चा कर रहे हैं, ताकि तकनीकी बदलाव का असर संतुलित रहे।
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