इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मरीजों को अस्पतालों के बीच भटकने से रोकने के लिए कार्ययोजना मांगी

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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मरीजों को अस्पतालों के बीच भटकने से रोकने के लिए कार्ययोजना मांगी

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  • Publish Date - September 16, 2026 / 12:45 AM IST,
    Updated On - September 16, 2026 / 12:45 AM IST

लखनऊ, 15 सितंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने सुलतानपुर से इलाज के लिए लखनऊ लाए गए नवजात की मौत के मामले में प्रदेश सरकार को चिकित्सा व्यवस्था मजबूत करने के लिए समयबद्ध और ठोस कार्ययोजना पेश करने का मंगलवार को निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजिव शुक्ल की खंडपीठ ने चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव को तत्काल और दीर्घकालिक उपायों की कार्ययोजना शपथपत्र के साथ पेश करने तथा प्रदेश के बजट में चिकित्सा सुविधाओं और सेवाओं के लिए आवंटित राशि का अनुपात बताने को कहा।

अदालत ने कहा कि धन की कमी बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने में बाधा नहीं बननी चाहिए।

अदालत ने ये निर्देश अशुतोष कुमार सिंह की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिए। याचिका नवजात की मौत से जुड़ी है, जिसे सुलतानपुर से लखनऊ लाकर केजीएमयू, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएलआईएमएस) और एसजीपीजीआई में इलाज के लिए ले जाया गया था।

पीठ ने कहा कि मामला केवल नवजात को पर्याप्त इलाज नहीं मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था से जुड़े व्यापक सवाल भी उठते हैं। अदालत ने नए मेडिकल कॉलेजों में पर्याप्त ढांचागत सुविधाएं, विशेषज्ञ सेवाएं और वेंटिलेटर जैसी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया, ताकि गंभीर मरीजों को लखनऊ न भेजना पड़े।

पीठ ने कहा कि यदि नवजात को उच्च चिकित्सा केंद्र भेजना जरूरी था तो एंबुलेंस में भी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं होनी चाहिए थीं, जबकि उसे सामान्य एंबुलेंस से लाया गया। वहीं, केजीएमयू के चिकित्सकों और परिजनों ने बच्चे को अस्पताल में दिखाए जाने तथा बिस्तर उपलब्ध होने या नहीं होने को लेकर अलग-अलग दावे किए। अदालत ने कहा कि इन विरोधाभासी दावों से सरकारी अस्पतालों में मरीजों और तीमारदारों के लिए प्रभावी मार्गदर्शन एवं परामर्श व्यवस्था की जरूरत स्पष्ट होती है।

पीठ ने राज्य सरकार को पूरे घटनाक्रम की जांच कराकर 15 दिन में रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने अभी किसी चिकित्सक या अस्पताल की लापरवाही पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला है। जांच में कमी या लापरवाही सामने आने पर जिम्मेदारी तय करने और परिवार को मुआवजा देने पर विचार किया जाएगा।

मामले की अगली सुनवाई एक अक्टूबर को होगी। पीठ ने चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव तथा केजीएमयू, एसजीपीजीआई और आरएमएलआईएमएस से संबंधित चिकित्सकों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई में शामिल होने का निर्देश दिया है।

भाषा सं आनन्‍द

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