बरेली (उप्र), 31 मार्च (भाषा) पिछले कुछ हफ्तों से रसोई गैस सिलेंडरों की कमी ने बरेली के लोगों को मिट्टी के तेल से जलाये जाने वाले चूल्हे और लालटेन ढूंढने पर मजबूर कर दिया है। इनमें से कई चीजें ईंधन के इस्तेमाल के तरीकों में आए बदलावों के कारण घरों से काफी पहले ही गायब हो चुकी थीं।
सरकार ने इस संकट के बीच राशन की दुकानों को खाना पकाने और रोशनी के लिए मिट्टी का तेल (केरोसिन) देने का निर्देश दिया है। इसकी वजह से लोग अपने घरों, पड़ोसियों के घरों और स्थानीय बाजारों में उन चूल्हों और लालटेनों को ढूंढने लगे हैं जो कभी आमतौर पर मिला करते थे लेकिन अब मिलना मुश्किल हो गए हैं।
स्थानीय लोगों ने बताया कि पिछले एक दशक में ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ जैसी योजनाओं के तहत रसोई गैस की बेहतर उपलब्धता और बिजली की बेहतर आपूर्ति के कारण मिट्टी के तेल पर निर्भरता काफी कम हो गई थी, इसी वजह से मिट्टी के तेल वाले चूल्हे और लालटेन इस्तेमाल से बाहर हो गए थे।
अपर जिलाधिकारी (वित्त और राजस्व) संतोष कुमार सिंह ने बताया कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये मिट्टी के तेल का वितरण अचानक बंद नहीं किया गया था बल्कि 2015 एवं 2018 के बीच इसे चरणबद्ध तरीके से कम किया गया था। उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए किया गया था क्योंकि पूरे उत्तर प्रदेश में रसोई गैस कनेक्शन और बिजली की सुविधा का विस्तार हो रहा था।
लेकिन हाल में रसोई गैस की किल्लत ने वक्त का पहिया घुमा दिया है और लोग फिर से पारंपरिक तरीकों की ओर लौट रहे हैं। कुछ लोगों ने तो मिट्टी के चूल्हों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है, जबकि इलेक्ट्रिक इंडक्शन का इस्तेमाल भी बढ़ गया है।
एक स्थानीय निवासी ने बताया, ‘‘लोग अब अपने घरों में पड़े कबाड़ को खंगाल रहे हैं और पड़ोसियों से पूछ रहे हैं कि क्या उनके पास कोई चूल्हा है जिसे वे कुछ दिनों के लिए उधार ले सकें।’’
बरेली कॉलेज की वरिष्ठ प्रोफेसर डॉक्टर वंदना शर्मा ने बताया कि वह पिछले दो दिनों से बाजार में मिट्टी के तेल से जलने वाला चूल्हा ढूंढने की कोशिश कर रही हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘यह चूल्हा मिल ही नहीं रहा है। दुकानदार एक हफ़्ते का समय मांग रहे हैं। एक समय था, जब हर घर में दो-दो चूल्हे इस्तेमाल होते थे। अब तो वे पूरी तरह से गायब ही हो गए हैं।’’
ग्रामीण इलाकों में भी हालात कुछ ऐसे ही हैं। भुता विकास खंड क्षेत्र के सत्येंद्र सिंह चौहान ने बताया कि एक समय था जब हर घर में लालटेन होना एक आम बात थी।
उन्होंने कहा, ‘‘पहले एक घर में तीन-तीन लालटेन हुआ करती थीं। एक आंगन में, एक कमरे के अंदर और एक घर के दरवाजे पर। लेकिन अब, हमारे गांव के किसी भी घर में एक भी लालटेन नहीं बची है।’’
डॉक्टर अर्चना सिंह ने बताया कि इस बदलाव के कारण अलग-अलग पीढ़ियों के बीच एक तरह का जुड़ाव भी टूट गया है।
उन्होंने कहा, ‘‘आजकल तो बहुत से विद्यार्थियों को यह भी नहीं पता कि मिट्टी के तेल का स्टोव क्या होता है।’’
फरीदपुर के नवरत्न लाल गौर ने बताया कि उन्हें एक स्टोव तो मिल गया है लेकिन बाजार में उसका पंप वॉशर नहीं मिल रहा है।
एजाज नगर गोटिया के हसीन मियां ने बताया कि उन्होंने कई दुकानों पर जाकर देखा लेकिन उन्हें न तो कोई नया स्टोव मिला और न ही कोई पुराना।
इस बीच, सरकार ने बताया कि ईंधन और रसोई गैस सिलेंडर की कालाबाजारी को रोकने के लिये 12 मार्च से अब तक पूरे राज्य में 17 हजार से ज़्यादा जगहों पर छापे मारे हैं और इस दौरान 17 लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है।
एक सरकारी बयान के मुताबिक इस दौरान रसोई गैस वितरकों के खिलाफ 33 मुकदमे और अन्य मामलों में 189 प्राथमिकियां दर्ज की गईं। इसके अलावा, 224 लोगों के ख़िलाफ़ अभियोजन की कार्यवाही शुरू की गई।
भाषा सं. सलीम राजकुमार
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