( सैमुएल कॉरनेल, क्वीन्सलैंड विश्वविद्यालय )
ब्रिस्बेन (ऑस्ट्रेलिया), 25 जून (द कन्वरसेशन) ऑस्ट्रेलिया में 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध लागू होने के छह महीने बाद भी 85 प्रतिशत से अधिक बच्चे सोशल मीडिया मंचों का इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इस कानून की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि बच्चे अब भी इन मंचों तक पहुंच बना रहे हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूकैसल की जनस्वास्थ्य शोधकर्ता कोर्टनी बार्नेस के नेतृत्व में किए गए और ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि टिकटॉक, एक्स, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्रतिबंधित सोशल मीडिया मंचों का उपयोग करने वाले बच्चों की संख्या में बहुत कमी नहीं आई है।
शोधकर्ताओं ने 12 से 16 वर्ष आयु वर्ग के 408 किशोरों पर सर्वेक्षण किया। यह सर्वेक्षण दिसंबर 2025 में कानून लागू होने से पहले और तीन महीने बाद किया गया। अध्ययन में 16 वर्ष की आयु सीमा से ठीक नीचे और उससे ऊपर के किशोरों की तुलना कर कानून के प्रभाव को अलग से समझने का प्रयास किया गया।
अध्ययन के अनुसार, अनुवर्ती सर्वेक्षण के समय 16 वर्ष से कम आयु के 85 प्रतिशत से अधिक बच्चे अब भी प्रतिबंधित सोशल मीडिया मंचों का उपयोग कर रहे थे जिनमें से अधिकतर बच्चे अपने स्वयं के खातों के जरिए इन मंचों तक पहुंच रहे थे।
करीब दो-तिहाई प्रतिभागियों ने बताया कि उन्हें आयु सत्यापन प्रक्रिया का सामना करना पड़ा, लेकिन सबसे सामान्य तरीका केवल उम्र पूछना था। कुछ बच्चों ने फर्जी खाते बनाए या निजी ब्राउजिंग का इस्तेमाल किया, जबकि प्रतिबंध से बचने के लिए वीपीएन का उपयोग अपेक्षाकृत कम पाया गया।
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों और 16 वर्ष से अधिक आयु के उन किशोरों के बीच सोशल मीडिया उपयोग में कोई उल्लेखनीय अंतर नहीं था जिन्हें अपने खाते जारी रखने की अनुमति थी।
हालांकि, अध्ययन के लेखकों ने इसकी सीमाओं को भी स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि प्रतिभागियों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी और संभव है कि अध्ययन किसी प्रभाव का पता लगाने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम न रहा हो।
इसके बावजूद, अध्ययन के निष्कर्ष ऑस्ट्रेलिया की ई-सेफ्टी आयुक्त संस्था के हालिया शोध से मेल खाते हैं, जिसमें पाया गया था कि कानून लागू होने के बाद भी लगभग 70 प्रतिशत बच्चों ने अपने सोशल मीडिया खाते बनाए रखे।
लेख में कहा गया है कि यह मान लेना अव्यावहारिक था कि प्रतिबंध लागू होते ही सभी बच्चे सोशल मीडिया का उपयोग बंद कर देंगे। किसी भी ऑनलाइन तकनीक में ऐसे रास्ते मौजूद रहते हैं जिनका इस्तेमाल नियमों को दरकिनार करने के लिए किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का तर्क है कि इस कानून का उद्देश्य तत्काल प्रभाव नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामाजिक बदलाव है। इसकी तुलना ब्रिटेन के तंबाकू नियंत्रण कानून से की गई है जिसके तहत एक निश्चित तिथि के बाद जन्मे लोगों को जीवनभर तंबाकू नहीं बेचा जाएगा।
लेख के अनुसार, जैसे धूम्रपान को धीरे-धीरे सामाजिक रूप से अस्वीकार्य बनाया गया, उसी तरह ऑस्ट्रेलिया का सोशल मीडिया कानून यह उम्मीद करता है कि बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच में देरी कर इसे बचपन का सामान्य हिस्सा बनने से रोका जा सकेगा।
हालांकि, शोधकर्ता मानते हैं कि सोशल मीडिया को तंबाकू की तरह नियंत्रित करना कहीं अधिक कठिन है, क्योंकि यह लगभग मुफ्त, आसानी से उपलब्ध और उपयोगकर्ताओं को अधिक समय तक जोड़े रखने के लिए डिजाइन किया गया है।
लेख में कहा गया है कि सामाजिक मानदंडों में बदलाव धीरे-धीरे होता है। सोशल मीडिया जोखिमपूर्ण और सनसनीखेज सामग्री को बढ़ावा देता है, जिससे बच्चों के लिए यह सामान्य व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। ऐसे में इसके प्रभाव को रातोंरात बदलने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
अध्ययन में यह भी चेतावनी दी गई है कि प्रतिबंधों के कुछ अनपेक्षित परिणाम हो सकते हैं। कुछ बच्चे फर्जी खातों, निजी ब्राउजिंग या ऐसे ऑनलाइन मंचों की ओर जा सकते हैं जिनकी निगरानी मुख्यधारा के सोशल मीडिया की तुलना में अधिक कठिन है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, इसका अर्थ यह नहीं है कि कानून विफल हो गया है, बल्कि यह दर्शाता है कि इसकी सफलता को ऐसे समय-फ्रेम में परखा जा रहा है जो इसके मूल उद्देश्य के अनुरूप नहीं है।
उनके अनुसार, इस नीति का सबसे बड़ा प्रभाव उन बच्चों पर पड़ सकता है जिन्होंने अभी सोशल मीडिया का उपयोग शुरू नहीं किया है। अध्ययन का अनुमान है कि इस कानून के वास्तविक और व्यापक प्रभाव को समझने में लगभग एक दशक का समय लग सकता है।
लेख में कहा गया है कि ऑस्ट्रेलिया इस प्रकार का कानून लागू करने वाला दुनिया का पहला देश है और अब अन्य देश भी इस दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। ऐसे में सोशल मीडिया आयु-प्रतिबंधों का मूल्यांकन उनके दीर्घकालिक सामाजिक प्रभावों के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि केवल इस बात से कि प्रतिबंध लागू होने के कुछ महीनों बाद कितने बच्चे अभी भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं।
द कन्वरसेशन मनीषा नरेश
नरेश