(अरनॉड रेबिलार्ड, म्युजियम आफ नैचुरल हिस्ट्री)
बर्लिन, आठ फरवरी (द कन्वरसेशन) हम कोप्रोलाइट नामक जीवाश्मीकृत मल के बारे में पहले से ही जानते थे। हालांकि हाल की एक खोज से यह बात भी सामने आई है कि उल्टी (रीगर्जिटेशन) भी जीवाश्म में बदल सकती है। जर्मनी में ब्रॉमाकर जीवाश्म स्थल पर एक अत्यंत असामान्य जीवाश्म मिला है-जीवाश्मीकृत उल्टी।
यह रीगर्जिटेशन तीन अलग-अलग जानवरों की हड्डियों के अवशेषों से बना है और यह ‘साइनैप्सिड’ समूह के एक शिकारी से संबंधित है। साइनैप्सिड जानवरों का वह समूह है जिसमें आधुनिक स्तनधारी भी शामिल हैं और इस शिकारी की मौजूदगी इस स्थल पर पहले ही दर्ज की जा चुकी थी।
इस स्थल की चट्टानें लगभग 29 करोड़ वर्ष पुरानी हैं और यहां से अब तक अत्यंत अच्छी तरह संरक्षित पौधों, उभयचरों और सरीसृपों के जीवाश्मों के साथ-साथ बड़ी संख्या में पदचिह्न भी मिल चुके हैं।
इस बार हमारी टीम को आंशिक रूप से पची हुई हड्डियों का एक छोटा समूह मिला, जिसमें कोई स्पष्ट संरचना या नियमित आकार नहीं था। इससे संकेत मिला कि यह मल नहीं, बल्कि किसी शिकारी द्वारा उगले गए अवशेष हैं। इस खोज का विवरण हाल ही में ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
लेकिन यह कैसे तय किया गया कि यह जीवाश्मीकृत उल्टी ही है?
यह जीवाश्म हड्डियों के एक सघन समूह के रूप में है। ब्रॉमाकर स्थल पर इससे पहले इस तरह का हड्डियों का जमाव कभी नहीं मिला था, जिससे संकेत मिलता है कि इन अवशेषों को किसी शिकारी ने निगला था और बाद में या तो मल के रूप में या फिर उगलकर बाहर निकाला था।
कोप्रोलाइट (जीवाश्मीकृत मल) के मामलों में हड्डियों के अवशेष आम तौर पर कार्बनिक मूल की एक स्पष्ट तलछटी संरचना (मल पदार्थ) के भीतर संरक्षित पाए जाते हैं, जो फॉस्फोरस से समृद्ध होती है और हड्डियों के पाचन से जुड़ी जीवाणु गतिविधि का परिणाम होती है। हालांकि, इस नमूने में हड्डियों के अवशेष ऐसी किसी संरचना से घिरे हुए नहीं हैं।
माइक्रो-एक्सआरएफ (एक्स-रे फ्लोरेसेंस स्पेक्ट्रोमेट्री) के जरिए किए गए रासायनिक विश्लेषण में इस मैट्रिक्स में फॉस्फोरस की लगभग अनुपस्थिति की पुष्टि हुई। फॉस्फोरस की यह कमी रीगर्जिटालाइट (जीवाश्मीकृत उल्टी) की एक विशिष्ट विशेषता मानी जाती है, जबकि कोप्रोलाइट में पाचन की अधिक अवधि के कारण फॉस्फोरस की मात्रा काफी अधिक होती है।
हमने इस जीवाश्म का त्रि-आयामी (सीटी स्कैन) परीक्षण भी किया। इस गैर-विनाशकारी विधि से प्रत्येक हड्डी का आभासी रूप से पुनर्निर्माण करना और उसकी सटीक पहचान संभव हो सकी।
कुल मिलाकर, अलग-अलग आकार के तीन भिन्न जानवरों को एक ही शिकारी ने निगला था और बाद में उन्हें आंशिक रूप से उगल दिया गया।
जीवाश्म रिकॉर्ड में रीगर्जिटालाइट अत्यंत दुर्लभ हैं और अब तक इतने प्राचीन स्थलीय पर्यावरण से संबंधित किसी भी रीगर्जिटालाइट का विवरण सामने नहीं आया था। इस प्रकार, यह खोज किसी स्थलीय कशेरुकी जीव की अब तक ज्ञात सबसे प्राचीन जीवाश्मीकृत उल्टी को दर्शाती है।
यह खोज प्रारंभिक पर्मियन काल के शिकारियों के आहार व्यवहार को समझने के लिए एक नया दृष्टिकोण भी खोलती है। ब्रॉमाकर स्थल से ऐसे दो मांसाहारी ज्ञात हैं, जो इन शिकारों को निगलने के लिए पर्याप्त बड़े थे-डॉर्सल क्रेस्ट से पहचाने जाने वाला डाइमेट्रोडॉन और समान आकार का एक अन्य मांसाहारी साइनैप्सिड, टैम्बाकार्निफेक्स।
द कन्वरसेशन
अमित नेत्रपाल
नेत्रपाल