शिक्षकों के साथ अभद्र व्यवहार के मामले बढ़े, स्कूल अभिभावकों से कैसे निपटें

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शिक्षकों के साथ अभद्र व्यवहार के मामले बढ़े, स्कूल अभिभावकों से कैसे निपटें

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  • Publish Date - August 26, 2026 / 11:58 AM IST,
    Updated On - August 26, 2026 / 11:58 AM IST

( कैरोलिन वाड – ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी, पॉल किडसन – ऑस्ट्रेलियन कैथोलिक यूनिवर्सिटी )

सिडनी, 26 अगस्त (द कन्वरसेशन) शिक्षकों और स्कूल प्रधानाचार्यों के साथ अभिभावकों के दुर्व्यवहार की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसे रोकने के लिए कुछ निजी स्कूलों ने अभिभावकों से आचार संहिता पर हस्ताक्षर करवाना शुरू किया है।

मीडिया में आई खबरों के अनुसार, कुछ प्रधानाचार्यों ने अभिभावकों के अधिकार-बोध, कर्मचारियों को डराने-धमकाने और अपने बच्चे के गलत व्यवहार को स्वीकार करने से इनकार जैसे मामलों पर चिंता जताई है।

सरकारी स्कूल भी अभद्र व्यवहार करने वाले अभिभावकों पर अंकुश लगाने के लिए नए कदम उठा रहे हैं। विक्टोरिया और दक्षिण ऑस्ट्रेलिया ने प्रधानाचार्यों को स्कूल परिसर में अभद्र व्यवहार करने वाले अभिभावकों के प्रवेश पर रोक लगाने का अधिकार देने वाले कानून बनाए हैं। इसमें आमने-सामने, ईमेल, फोन या सोशल मीडिया के जरिए दुर्व्यवहार करने वाले अभिभावक भी शामिल हैं। न्यू साउथ वेल्स भी इसी तरह के कानूनों पर विचार कर रहा है।

—– समस्या कितनी गंभीर है? —–

अभिभावकों को स्कूल के फैसलों पर सवाल उठाने, अपनी चिंताएं रखने और अपने बच्चों की ओर से पक्ष रखने में सक्षम होना चाहिए। शिक्षा में सार्थक अभिभावक सहभागिता के लिए ये सभी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन शोध से स्पष्ट है कि शिक्षकों के साथ अभद्र व्यवहार बढ़ रहा है।

ऑस्ट्रेलिया में पिछले 15 वर्षों से किए जा रहे सर्वेक्षणों में स्कूल के प्रधानाचार्यों, उप-प्रधानाचार्यों और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के अनुभवों का अध्ययन किया गया है। इनमें पाया गया कि अभिभावक और देखभालकर्ता की ओर से धमकी तथा अभद्र व्यवहार के मामले बढ़ रहे हैं।

साल 2025 में हिंसा की धमकियों की करीब दो-तिहाई रिपोर्ट में अभिभावकों और देखभालकर्ताओं को स्रोत बताया गया, जबकि 2011 में यह आंकड़ा 25 प्रतिशत से भी कम था। 2025 में प्रधानाचार्यों को धमकाने के करीब 90 प्रतिशत मामलों में अभिभावक या देखभालकर्ता शामिल थे।

समस्या केवल प्रत्यक्ष धमकियों तक सीमित नहीं है। शोध के मुताबिक, स्कूल के पदाधिकारियों को लगातार शिकायतों, आक्रामक संवाद और अभिभावकों की हर समय उपलब्ध रहने की अपेक्षाओं से भी निपटना पड़ता है।

शिक्षक भी अत्यधिक संवाद की मांग, मौखिक दुर्व्यवहार और धमकी भरे व्यवहार जैसी स्थितियों की शिकायत करते हैं।

—– ऐसा क्यों हो रहा है? —–

पिछले कुछ दशकों में छात्रों और परिवारों को स्कूलों से मिलने वाली सुविधाओं और सेवाओं को लेकर अपेक्षाएं बढ़ी हैं। स्कूल चुनने के अधिक विकल्प और जवाबदेही की बढ़ती मांग ने भी परिवारों और स्कूलों के संबंधों को बदला है। अब स्कूलों तक पहुंच, उनकी जवाबदेही और शैक्षणिक फैसलों में अभिभावकों के प्रभाव को लेकर अपेक्षाएं बढ़ गई हैं।

शोध में स्कूलों के साथ अधिक उपभोक्तावादी संबंध की पहचान की गई है। स्कूल प्रबंधन के लिए इसका मतलब तत्काल जवाब की अपेक्षा, पेशेवर फैसलों पर सवाल, बच्चे के लिए व्यक्तिगत नतीजों की मांग और स्कूल के जवाब से असंतुष्ट होने पर शिकायत को उच्च स्तर तक ले जाना हो सकता है।

डिजिटल संचार ने परिवारों और स्कूलों के बीच संपर्क आसान बनाया है, लेकिन इससे बातचीत की गति, पहुंच और उसके परिणाम भी बदल गए हैं।

मसलन, कोई चिंता जल्द ही अभिभावकों के व्हाट्सऐप समूहों, सोशल मीडिया या अन्य सामुदायिक नेटवर्क तक पहुंच सकती है। इससे मूल बातचीत से कहीं आगे तक मतभेद बढ़ सकता है।

स्कूल के कर्मचारियों को भी हर अन्य व्यक्ति की तरह सुरक्षित कार्यस्थल का अधिकार है।

हालांकि, कानून या आचार संहिता केवल सीमाएं तय कर सकते हैं, पहुंच प्रतिबंधित कर सकते हैं और व्यवहार असुरक्षित होने पर कानूनी उपाय उपलब्ध करा सकते हैं। वे सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित नहीं कर सकते और न ही संबंध खराब होने के बाद विश्वास बहाल कर सकते हैं।

इसीलिए कानून को रोकथाम के बजाय सुरक्षा के उपाय के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि किसी प्रधानाचार्य को किसी अभिभावक को स्कूल परिसर में आने या कर्मचारियों से संपर्क करने से रोकना पड़ रहा है, तो संबंध पहले ही गंभीर रूप से खराब हो चुका है।

—– स्कूल और सरकारें क्या कर सकती हैं? —–

कोई एक उपाय अभिभावकों और स्कूलों के बीच विवाद को पूरी तरह रोक नहीं सकता।

संवाद और कर्मचारियों की उपलब्धता को लेकर स्पष्ट अपेक्षाएं शुरुआत में ही सीमाएं तय कर सकती हैं। इस मामले में अभिभावकों की आचार संहिता या व्यवहार संबंधी समझौते उपयोगी हो सकते हैं। इनके जरिए सम्मानजनक संवाद और अस्वीकार्य व्यवहार के परिणामों के बारे में स्पष्ट जानकारी दी जा सकती है।

हालांकि, इस बात के सीमित प्रमाण हैं कि ऐसे समझौते खुद गंभीर रूप से बिगड़े संबंधों को रोक या सुधार सकते हैं।

स्कूल पदाधिकारियों और शिक्षकों को अभिभावकों के साथ मुश्किल बातचीत संभालने, विवाद बढ़ने के संकेत पहचानने और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त मदद लेने के लिए बेहतर प्रशिक्षण की भी जरूरत है।

उन्हें संस्थागत समर्थन भी मिलना चाहिए, ताकि किसी समस्या के असहनीय होने तक उन्हें अकेले उससे न जूझना पड़े। इसमें स्पष्ट शिकायत-निपटान प्रक्रिया और ऐसे मामलों में वरिष्ठ अधिकारियों या शिक्षा प्रणाली के स्तर पर सहायता शामिल होनी चाहिए, जब बातचीत लगातार, अनुचित या अभद्र हो जाए।

हालांकि, कुछ परिस्थितियों में ये उपाय भी पर्याप्त नहीं होंगे। जब व्यवहार धमकीपूर्ण, डराने वाला या अपमानजनक हो जाए, तो प्राथमिकता संबंध सुधारने के बजाय संबंधित लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की होनी चाहिए।

स्कूल ऐसे स्थान बने रहने चाहिए जहां परिवार संवाद कर सकें, सवाल उठा सकें और असहमति जता सकें। साथ ही, वे कर्मचारियों के लिए सुरक्षित कार्यस्थल भी होने चाहिए। इनमें से किसी एक की कीमत पर दूसरे को नहीं चुना जाना चाहिए।

कानून अभद्र व्यवहार पर रोक लगा सकता है, लेकिन सम्मानजनक व्यवहार पैदा नहीं कर सकता। वह संबंध टूटने पर कर्मचारियों की रक्षा कर सकता है, लेकिन खोया हुआ विश्वास दोबारा कायम नहीं कर सकता।

इसके लिए काम काफी पहले शुरू करना होगा। विवाद पैदा होने से पहले ही संवाद, शिकायतों और स्वीकार्य व्यवहार को लेकर स्पष्ट अपेक्षाएं तय करनी होंगी। शिक्षा व्यवस्था को भी उस समय हस्तक्षेप के लिए तैयार रहना होगा, जब स्कूल और परिवार के बीच संबंध बिगड़ने की शुरुआत हो।

द कन्वरसेशन मनीषा वैभव

वैभव