भारतीय मूल के अमेरिकी सर्जन ने नाक के रास्ते गोल्फ की गेंद के आकार का मस्तिष्क ट्यूमर निकाला

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भारतीय मूल के अमेरिकी सर्जन ने नाक के रास्ते गोल्फ की गेंद के आकार का मस्तिष्क ट्यूमर निकाला

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  • Publish Date - July 31, 2026 / 03:49 PM IST,
    Updated On - July 31, 2026 / 03:49 PM IST

(सागर कुलकर्णी)

वाशिंगटन, 31 जुलाई (भाषा) भारतीय मूल के अमेरिकी सेना के एक सर्जन ने एक मरीज के गोल्फ की गेंद के आकार के मस्तिष्क ट्यूमर को नाक के रास्ते निकालने की अभिनव और न्यूनतम चीरा वाली शल्य प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस तकनीक की मदद से मरीज को ‘ओपन ब्रेन सर्जरी’ यानी खोपड़ी खोलकर की जाने वाली मस्तिष्क की बड़ी सर्जरी की प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ा।

वाशिंगटन के निकट स्थित ‘वॉल्टर रीड नेशनल मिलिट्री मेडिकल सेंटर’ में विशेषज्ञ सर्जन मेजर जगतकुमार पटेल ने न्यूरोसर्जन लेफ्टिनेंट कर्नल चार्ल्स मिलर के साथ मिलकर मरीन कोर स्टाफ सार्जेंट एंडी आर्चर की यह दुर्लभ सर्जरी की। आर्चर पिछले 15 वर्षों से इस ट्यूमर से पीड़ित थे।

अमेरिकी रक्षा विभाग ने एक बयान में कहा कि इस प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए दोनों विशेषज्ञों के बीच बेहद सटीक और समन्वित सहयोग आवश्यक था।

करीब 4.4 सेंटीमीटर आकार का यह ट्यूमर आर्चर की पिट्यूटरी ग्रंथि के सामने स्थित था और उनकी ऑप्टिक नर्व (दृष्टि तंत्रिका) पर दबाव डाल रहा था।

रक्षा विभाग के अनुसार, डॉ. पटेल ने मरीज की जटिल नासिका संरचना का अध्ययन कर एक ऐसी शल्य योजना तैयार की, जिससे एंडोस्कोप की मदद से नाक के मार्ग से सुरक्षित रास्ता बनाकर गोल्फ की गेंद के आकार के इस ट्यूमर को निकाला जा सके।

बयान में डॉ. पटेल के हवाले से कहा गया, ‘‘आज के समय में यदि ट्यूमर सही आकार का हो और ऐसी जगह स्थित हो जहां इस तकनीक से पहुंचा जा सके, तो खोपड़ी खोलकर की जाने वाली बड़ी मस्तिष्क सर्जरी की जरूरत नहीं होती। नाक के रास्ते हमें सबसे बेहतर पहुंच मिलती है और ट्यूमर को पूरी तरह निकालने की सबसे अधिक संभावना रहती है।’’

शल्य मार्ग तैयार करने के बाद डॉ. पटेल ने एंडोस्कोपिक कैमरे के माध्यम से ऑपरेशन मॉनिटर पर ट्यूमर का उच्च गुणवत्ता वाला ‘क्लोज-अप’ दृश्य उपलब्ध कराया। इससे लेफ्टिनेंट कर्नल मिलर को दोनों हाथों का उपयोग करते हुए ट्यूमर को सुरक्षित तरीके से अलग करने और निकालने में मदद मिली।

डॉ. पटेल ने कहा, ‘‘जब उन्हें महत्वपूर्ण संरचनाओं तक पहुंचना होता, तो मैं कैमरे को और पास ले जाता था जिससे उन्हें बिल्कुल स्पष्ट दृश्य मिलता था।’’

चिकित्सकों की टीम ने इस महीने की शुरुआत में ट्यूमर का 99 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सफलतापूर्वक निकाल दिया।

हालांकि, ट्यूमर का एक अत्यंत सूक्ष्म हिस्सा ऑप्टिक नर्व के पीछे कसकर लिपटा हुआ रह गया, जिसे निकालने पर गंभीर जोखिम हो सकता था। रक्षा विभाग के अनुसार, ऐसा करने से मरीज को स्ट्रोक या स्थायी दृष्टि हानि हो सकती थी।

डॉ. पटेल ने कहा, ‘‘ऐसे समय आपको खुद से पूछना पड़ता है कि क्या उस आखिरी मिलीमीटर ट्यूमर को निकालने के लिए मरीज को स्ट्रोक का खतरा देना या उसकी पूरी तरह सुरक्षित दृष्टि को स्थायी रूप से प्रभावित करना उचित होगा?’’

सर्जनों ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि बचे हुए ट्यूमर का सूक्ष्म हिस्सा दोबारा बढ़ने की संभावना बहुत कम है।

सर्जरी पूरी करने के लिए चिकित्सकों ने आर्चर के पैर से ऊतक का एक छोटा हिस्सा लेकर खोपड़ी के ‘बेस’ का पुनर्निर्माण किया, ताकि ऑपरेशन वाली जगह को सुरक्षित रूप से बंद किया जा सके।

रक्षा विभाग के अनुसार, ऑपरेशन के केवल दो दिन बाद आर्चर के शरीर पर किसी बड़ी मस्तिष्क सर्जरी के कोई स्पष्ट बाहरी संकेत नहीं थे।

उनकी दृष्टि में पहले से ही सुधार शुरू हो गया था, जबकि ऑपरेशन के बाद उन्हें केवल सामान्य सिरदर्द और उस पैर में हल्का दर्द महसूस हो रहा था, जहां से ऊतक लिया गया था।

भाषा गोला नरेश

नरेश