नयी दिल्ली, छह जुलाई (भाषा) प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) ने सोमवार को कहा कि राज्यों में महिलाओं के लिए चल रहीं ‘बिना-शर्त नकद अंतरण’ (यूसीटी) योजनाओं की राशि की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए, ताकि महंगाई और घरेलू खर्च में बदलाव के अनुरूप यह पर्याप्त बनी रहे।
परिषद ने एक कार्यपत्र में कहा कि महाराष्ट्र और ओडिशा में लागू यूसीटी योजनाओं से लाभार्थियों की बचत और खपत में उल्लेखनीय और व्यापक रूप से समान सुधार देखने को मिला है।
‘भारत में महिलाओं के लिए बिना-शर्त नकद अंतरण कार्यक्रम: महाराष्ट्र और ओडिशा से साक्ष्य’ शीर्षक वाले अध्ययन में महाराष्ट्र की ‘मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना’ (पात्र महिलाओं को 1,500 रुपये मासिक) और ओडिशा की ‘सुभद्रा योजना’ (दो किस्तों में सालाना 10,000 रुपये) का विश्लेषण किया गया है।
कार्यपत्र के मुताबिक, दोनों योजनाओं से लाभार्थियों के बैंक खातों में महीने के अंत का शेष (बैलेंस) महाराष्ट्र में करीब 84 प्रतिशत और ओडिशा में 45 प्रतिशत बढ़ा, जो प्रति लाभार्थी क्रमश: लगभग 6,884 रुपये और 6,887 रुपये की वृद्धि दर्शाता है।
इसके अलावा, मासिक खपत व्यय में भी महाराष्ट्र में 46 प्रतिशत और ओडिशा में 28 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
इसमें सुझाव दिया गया है कि दोनों योजनाओं को जारी रखने के साथ ‘कैश-प्लस’ मॉडल में विकसित किया जाए, जिसमें नकद सहायता के साथ स्वैच्छिक कौशल विकास, डिजिटल साक्षरता और स्वयं-सहायता समूह से जुड़ाव जैसे तत्व शामिल हों।
इसके मुताबिक, इन योजनाओं का परिवार के अन्य सदस्यों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। मसलन, सुभद्रा योजना में लाभार्थियों के खाते के शेष में 10 प्रतिशत वृद्धि से रिश्तेदारों के खर्च में 1.9 प्रतिशत की कमी आई, जबकि महाराष्ट्र की लाडकी बहिन योजना के तहत रिश्तेदारों के खाते का शेष 23 प्रतिशत बढ़ा और उनका खर्च 49 प्रतिशत घटा।
खर्च के रुझान में भी बदलाव देखा गया, जिसमें जीवनशैली, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़े मदों पर खर्च बढ़ा है। साथ ही, लाभार्थियों के बीच यूपीआई के उपयोग में भी तेजी आई है।
कार्यपत्र के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 तक 15 से अधिक राज्यों ने महिलाओं के खातों में सीधे मासिक या वार्षिक नकद अंतरण की योजना चलाई हुई थी, जिन पर कुल अनुमानित व्यय लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये है और इससे करीब 12 करोड़ महिलाएं लाभान्वित हो रही हैं।
परिषद ने कहा कि महिलाओं को सीधे आय सहायता देना घरेलू कल्याण सुधारने, वित्तीय समावेशन बढ़ाने और महिला-पुरुष आर्थिक असमानता कम करने का प्रभावी एवं किफायती तरीका साबित हो रहा है।
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