नयी दिल्ली, 21 जुलाई (भाषा) राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने फिनोलेक्स समूह के शेयर को लेकर लंबे समय से जारी पारिवारिक विवाद में प्रकाश पी छाबड़िया की अपीलें खारिज कर दी हैं।
ये अपीलें एनसीएलटी के उस आदेश के खिलाफ थीं, जिसमें उनके भाई दीपक किशन छाबड़िया को फिनोलेक्स शेयरों को लेकर लंबे समय से जारी ‘बोर्डरूम’ विवाद से जुड़ी नौ साल पुरानी कंपनी याचिका में संशोधन की अनुमति दी गई थी।
अपीलीय न्यायाधिकरण की दो सदस्यीय पीठ ने मुंबई स्थित राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के एक जून, 2026 के आदेश को सही ठहराया। एनसीएलटी ने दीपक छाबड़िया को 2026 की कंपनी याचिका में संशोधन की अनुमति दी थी और कहा था कि समय-सीमा का मुद्दा मुख्य मामले की अंतिम सुनवाई के दौरान तय किया जाएगा।
इस आदेश को प्रकाश छाबड़िया और ऑर्बिट इलेक्ट्रिकल्स ने अपीलीय न्यायाधिकरण में चुनौती दी थी। हालांकि, अपीलीय न्यायाधिकरण ने दोनों अपीलें खारिज करते हुए कहा कि हमें ऐसा कोई कारण नहीं दिखता जिससे यह कहा जा सके कि रिकॉर्ड पर संशोधन रखना शक्ति का गैर-कानूनी इस्तेमाल होगा, खासकर तब जब अंतिम सुनवाई में समय-सीमा का मुद्दा खुला रखा गया हो।
दीपक छाबड़िया ने जनवरी, 2026 में याचिका में संशोधन कर सदस्यों के रजिस्टर में सुधार, प्रकाश छाबड़िया का नाम हटाने, मूल शेयर प्रमाणपत्र वापस दिलाने तथा 2019 और 2021 की असाधारण आम बैठकों (ईओजीएम) में स्वीकृत कंपनी के संचालन के नियम में संशोधनों को चुनौती देने की अनुमति देने का आग्रह किया था।
प्रकाश छाबड़िया की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि संशोधन का आवेदन समय-सीमा से काफी विलंब से दायर किया गया है और इसे स्वीकार करने से उनके मुवक्किल को प्राप्त वैधानिक अधिकार प्रभावित होंगे। हालांकि, उन्होंने बाद की घटनाओं के रूप में दोनों ईओजीएम को रिकॉर्ड पर लाने पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
दीपक छाबड़िया की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामजी श्रीनिवासन ने कहा कि वर्ष 2016 की मूल याचिका में पहले ही कंपनी अधिनियम की धारा 58 और 59 का हवाला दिया गया था। उनका तर्क था कि शेयर हस्तांतरण अवैध था और सदस्यों के रजिस्टर में संशोधन की मांग केवल उसके परिणामस्वरूप की गई अतिरिक्त राहत है।
कंपनी अधिनियम की धारा 58 कंपनी द्वारा शेयर हस्तांतरण का पंजीकरण करने से इनकार किए जाने से जुड़े विवादों को नियंत्रित करती है और इससे प्रभावित पक्ष को एनसीएलटी के समक्ष अपील करने का अधिकार देती है। वहीं, धारा 59 एनसीएलटी को कंपनी के सदस्यों के रजिस्टर (सदस्यों का रजिस्टर) में गलतियों को सुधारने या उसमें संशोधन करने का अधिकार प्रदान करती है।
अपीलीय न्यायाधिकरण ने कहा कि हालांकि एनसीएलटी ने संशोधन में लगभग 10 वर्ष की देरी को स्वीकार किया था, लेकिन उसने संशोधन के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की और समय-सीमा का मुद्दा अंतिम सुनवाई के लिए खुला छोड़ दिया।
न्यायाधिकरण ने यह भी कहा कि यदि वर्ष 2016 की बोर्ड बैठक अंततः अवैध पाई जाती है तो उसके आधार पर पारित बाद के सभी प्रस्ताव स्वतः निरस्त हो जाएंगे।
यह विवाद 1,00,300 शेयरों को लेकर है। इनके बारे में प्रकाश छाबड़िया का दावा है कि उनके दिवंगत पिता प्रह्लाद परसराम छाबड़िया ने उन्हें स्नेहवश उपहार में दिए थे। उनका कहना है कि 31 मार्च, 2016 की बोर्ड बैठक में इस हस्तांतरण को मंजूरी दी गई थी, जिसमें दीपक छाबड़िया भी मौजूद थे।
वहीं, दीपक छाबड़िया ने 2016 में एनसीएलटी का रुख करते हुए दावा किया था कि ऐसी कोई बोर्ड बैठक हुई ही नहीं थी और उससे जुड़े सभी प्रस्तावों को निरस्त और अमान्य घोषित करने का आग्रह किया था।
प्रह्लाद परसराम छाबड़िया का पांच मई, 2016 को निधन हो गया था और उनके लगभग 16,000 शेष शेयर अब भी लंबित हैं।
भाषा रमण अजय
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