नयी दिल्ली, 24 मार्च (भाषा) दिवाला और ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत पटरी पर आई कंपनियों के वित्तीय और परिचालन प्रदर्शन में सुधार देखा गया है। इन कंपनियों की बिक्री और परिसंपत्ति कारोबार में मजबूत वृद्धि हुई है। भारतीय प्रबंध संस्थान-अहमदाबाद (आईआईएम अहमदाबाद) के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है।
यह शोध अध्ययन 2023 में किए गए एक पूर्व अध्ययन पर आधारित है, जिसमें 2013-2022 की अवधि के दौरान पुनर्गठन के बाद की अवधि में कंपनियों का विश्लेषण किया गया था।
एक बयान में कहा गया है कि अध्ययन के तहत नये घटनाक्रमों को शामिल करने के लिए 2025 तक इसका विस्तार कर विश्लेषण को अद्यतन और व्यापक बनाने का प्रयास किया गया है।
पुनर्गठन प्रक्रिया से गुज़री कुल 1,194 कंपनियां इस अध्ययन का हिस्सा थीं।
अध्ययन में पाया गया कि पुनर्गठन के बाद के पांच साल में गठित कंपनियों की औसत बिक्री में 89 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो व्यावसायिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण पुनरुद्धार का संकेत है।
परिसंपत्ति उपयोग में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ। इसी अवधि के दौरान परिसंपत्ति कारोबार अनुपात में लगभग 131 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
अध्ययन के अनुसार, इन कंपनियों के पूंजीगत व्यय में पांच साल में लगभग 106 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जो निवेश गतिविधियों में सुधार और आर्थिक व्यवहार्यता में वृद्धि को दर्शाता है।
भारतीय ऋण शोधन एवं दिवाला बोर्ड (आईबीबीआई) ने बताया कि औसत परिसंपत्ति आधार में भी विस्तार हुआ। यह समाधान के पहले वर्ष में 228.33 करोड़ रुपये था जो पांचवें वर्ष में लगभग 11.5 प्रतिशत बढ़कर 254.60 करोड़ रुपये हो गया।
समाधान वाली कंपनियों के बाजार पूंजीकरण में भी तीव्र वृद्धि दर्ज की गई।
अध्ययन के अनुसार, कर्जदाताओं के साथ सफल समाधान के बाद कुल बाजार मूल्यांकन पांच वर्षों की अवधि में लगभग 2.8 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर नौ लाख करोड़ रुपये हो गया। यह निवेशकों के बढ़ते विश्वास और वृद्धि की संभावनाओं को बताता है।
अध्ययन में पाया गया कि आईबीसी व्यवस्था के तहत संकटग्रस्त कंपनियों को पटरी पर लाने से संबंधित कंपनियों के प्रमुख वित्तीय और परिचालन संकेतकों में सुधार हुआ है।
इस समाधान प्रक्रिया ने कंपनियों को दीर्घकालिक व्यवहार्यता बहाल करने, नए निवेश आकर्षित करने और कुल मिलाकर उत्पादकता बढ़ाने में सक्षम बनाया है।
भाषा रमण अजय
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