नयी दिल्ली, 15 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में उत्तर प्रदेश सरकार की याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि राज्य आंध्र प्रदेश से पाइपलाइन के जरिए लाई गई प्राकृतिक गैस पर स्थानीय मूल्य-वर्धित कर (वैट) नहीं लगा सकता है।
न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2012 के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड, टाटा केमिकल्स और इफको के खिलाफ राज्य के कर आकलन आदेश रद्द किए गए थे।
शीर्ष अदालत ने कहा कि आंध्र प्रदेश तट पर स्थित केजी-डी6 बेसिन से आपूर्ति की गई गैस की बिक्री अंतरराज्यीय लेनदेन है और इस पर केवल केंद्रीय बिक्री कर (सीएसटी) कानून ही लागू होगा।
पीठ ने 94 पृष्ठों के अपने आदेश में स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में राज्यों को कर लगाने का अधिकार नहीं है।
न्यायालय ने कहा कि संविधान के तहत अंतरराज्यीय व्यापार और वाणिज्य से जुड़े कराधान का अधिकार केंद्र सरकार के पास है और राज्यों द्वारा इस क्षेत्र में हस्तक्षेप करना संघीय संतुलन के खिलाफ होगा।
यह मामला उस गैस से जुड़ा था जिसे आंध्र प्रदेश के गादीमोगा डिलीवरी प्वाइंट से खरीदारों को सौंपा गया और बाद में पाइपलाइन के जरिए गुजरात होते हुए उत्तर प्रदेश तक पहुंचाया गया।
राज्य सरकार का तर्क था कि पाइपलाइन में गैस के मिश्रण के कारण यह स्थानीय बिक्री बन जाती है, जिस पर 21 प्रतिशत वैट लगाया जा सकता है।
हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने इस ‘तकनीकी’ दलील को खारिज करते हुए कहा कि यदि बिक्री अनुबंध के कारण माल एक राज्य से दूसरे राज्य में जाता है, तो वह अंतरराज्यीय बिक्री ही मानी जाएगी।
इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने कहा कि 2016 में सीएसटी कानून में किया गया संशोधन इस स्थिति को स्पष्ट करता है और यह संशोधन पूर्व के मामलों पर भी लागू होता है।
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