नयी दिल्ली, नौ अगस्त (भाषा) रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने के लिए अमेरिकी सीनेट में हुए मतदान से रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति में व्यवधान का जोखिम बढ़ गया है, लेकिन इससे भारत और चीन को होने वाले कच्चे तेल के प्रवाह में तुरंत बदलाव की संभावना कम है। केपलर के विश्लेषक सुमित रितोलिया ने यह बात कही।
अमेरिकी सीनेट ने शुक्रवार को एक रूस प्रतिबंध विधेयक पारित किया, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उन देशों के आयात पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का अधिकार देगा, जो रूसी तेल और गैस के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हैं। लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एक्ट ऑफ 2026 रूसी ऊर्जा के पांच सबसे बड़े खरीदारों को लक्षित करता है और इसका उद्देश्य तेल व गैस की बिक्री से रूस को होने वाली आय में कटौती करना है।
इस कदम को अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से मंजूरी मिलनी बाकी है और इसके प्रभावी होने से पहले आगे के विधायी व प्रशासनिक चरणों से गुजरना होगा।
रितोलिया के अनुसार, इन उपायों के समक्ष अभी भी विधायी और प्रशासनिक बाधाएं हैं, जबकि इनका प्रभाव काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रशासन इन्हें कितनी आक्रामक तरीके से लागू करता है।
उन्होंने कहा कि किसी भी प्रतिबंध का समय बहुत महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि वैश्विक कच्चे तेल के बाजार में अपेक्षाकृत कमी बनी हुई है और पश्चिम एशिया की आपूर्ति पर अनिश्चितता ने वैकल्पिक स्रोतों के महत्व को बढ़ा दिया है। इसलिए रूसी तेल पर एक महत्वपूर्ण प्रतिबंध केवल मौजूदा व्यापार प्रवाह को मोड़ने के बजाय वैश्विक संतुलन को सख्त कर सकता है।
रितोलिया ने कहा कि रूसी कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरी कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण आपूर्ति ‘हेज’ बन गया है, जिससे पारंपरिक पश्चिम एशियाई आपूर्ति मार्गों में व्यवधानों के प्रति उनका जोखिम कम हो गया है। उन्होंने कहा कि भारत के लिए कम समय में रूसी तेल को बदलना अगर असंभव नहीं, तो बहुत मुश्किल होगा।
भाषा पाण्डेय अजय
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