(टिकेश्वर पटेल )
रायपुर, 14 अप्रैल (भाषा) छत्तीसगढ़ की अनुसूचित-जनजाति आरक्षित बस्तर लोकसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार प्रकाश कुमार गोटा 19 साल के थे जब नक्सलियों ने उनके पिता एवं सलवा जुडूम के पूर्व नेता की हत्या कर दी थी। विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए गोटा ने किर्गिस्तान में एमबीबीएस की पढ़ाई की और अब अपने क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए आगामी लोकसभा चुनाव में किस्मत आजमा रहे हैं।
बस्तर में मुख्य चुनावी मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के बीच माना जा रहा है। हालांकि गोटा का दावा है कि क्षेत्र में आदिवासी युवाओं पर उनका प्रभाव है।
उग्रवाद प्रभावित बीजापुर जिले के एक गांव के रहने वाले गोटा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में कहा कि आदिवासी राज्य की आबादी का 32 प्रतिशत हिस्सा हैं, फिर भी वे विकास कार्यों और योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाए हैं। उन्होंने कहा, ‘‘दोनों प्रमुख पार्टियों ने बस्तर के लोगों को हमेशा निराश किया है, यही वजह है कि मैंने क्षेत्र में वास्तविक बदलाव लाने के लिए चुनावी लड़ाई में उतरने का फैसला किया।’’
मुरिया जनजाति से आने वाले गोटा (32) बीजापुर के फरसेगढ़ गांव के निवासी हैं और वर्तमान में चुनाव के कारण बस्तर जिले के मुख्यालय जगदलपुर में एक किराए के मकान में रह रहे हैं।
प्रकाश गोटा के पिता चिन्ना राम गोटा, 2011 में भंग किए गए माओवादी विरोधी नागरिक लड़ाका समूह सलवा जुडूम के सक्रिय नेता थे। चिन्ना राम की 2012 में फरसेगढ़ से लगभग दो किमी दूर कुकरेल गांव में नक्सलियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। माओवादियों ने 2013 में इसी तरह के हमले में प्रकाश गोटा के पिता के बड़े भाई की भी हत्या कर दी थी।
प्रकाश गोटा ने कहा कि उनके पिता ने कांग्रेस के दिवंगत नेता महेंद्र कर्मा के साथ काम किया था, जिन्हें सलवा जुडूम आंदोलन के दौरान नक्सलियों के खिलाफ सख्त रुख के लिए ‘बस्तर टाइगर’ कहा जाता था।
वर्ष 2013 में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के दौरान झीरम घाटी नक्सली हमले में कर्मा की मौत हो गई थी।
गोटा ने कहा, ‘‘जब मेरे पिता की हत्या हुई तब मैं एक नर्सिंग कॉलेज में प्रथम वर्ष का छात्र था। मुझे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी क्योंकि मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। मेरे चार भाई और दो बहनें हैं। मैं भाई-बहनों में दूसरे स्थान पर हूं। मेरी मां गृहिणी है।’’
गोटा ने क्षेत्र में निर्माण कार्यों और तेंदू पत्ता संग्रहण के लिए एक उप-ठेकेदार के रूप में काम किया और इससे उन्हें किर्गिस्तान में अपनी मेडिकल पढ़ाई के लिए धन जुटाने में मदद मिली।
उन्होंने कहा, “2016 में, मैं एमबीबीएस करने के लिए किर्गिस्तान गया था। मैंने शिक्षा ऋण प्राप्त करने का प्रयास किया लेकिन सफलता नहीं मिली। संघर्ष जारी रहा क्योंकि मुझे अपने परिवार की वित्तीय स्थिति के कारण कोविड-19 महामारी के दौरान घर लौटना पड़ा।’’
गोटा ने फिर से एक उपठेकेदार के रूप में काम किया और किर्गिस्तान में अपनी मेडिकल पढ़ाई फिर से शुरू करने में कामयाब रहे और एमबीबीएस पूरा करने के बाद जून 2023 में भारत लौट आए।
हालांकि, वह भारत में चिकित्सा अभ्यास करने की पात्रता के लिए राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड द्वारा आयोजित विदेशी मेडिकल स्नातक परीक्षा (एफएमजीई) में शामिल नहीं हुए।
उन्होंने कहा, ‘‘पिछले साल अगस्त में मेरे परिवार पर एक और कहर टूटा जब नक्सलियों ने मेरे बड़े भाई महेश कुमार का अपहरण कर लिया, जो भाजपा की बीजापुर जिला इकाई के प्रचार विंग के प्रमुख थे।’’
बाद में महेश को एक जंगल में खोजा गया और गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया। उन्होंने कहा कि महेश तब से कोमा में हैं।
यह पूछे जाने पर कि वह अपने भाई की तरह भाजपा में क्यों नहीं शामिल हुए, गोटा ने कहा कि वह राजनीति में नहीं आना चाहते थे और नौकरी करना चाहते थे।
उन्होंने कहा, ‘‘माओवादी हिंसा के पीड़ितों के लिए पुनर्वास योजना के तहत सुरक्षित आवास और सरकारी नौकरी का प्रावधान है, लेकिन हमें इसमें से कुछ भी नहीं मिला। इस सब वजहों से मैं भाजपा और कांग्रेस से निराश हो गया।’’
गोटा ने कहा, पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर गरीबी, अशिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण बस्तर माओवादियों का गढ़ बन गया है।
चुनाव लड़ने के बारे में गोटा ने कहा, ‘‘मेरे पिता ने क्षेत्र को नक्सली खतरे से मुक्त कराने की लड़ाई में योगदान दिया था और मैं बस्तर में बदलाव लाने के लिए इन सभी मुद्दों को संबोधित करना चाहता हूं।’’
हालांकि, गोटा ने मैदान में उतरने का निर्णय अचानक लिया। उन्होंने कहा, ‘‘जब उम्मीदवारों ने पहले चरण के चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करना शुरू कर दिया था, तो मेरे दोस्तों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मुझे मैदान में उतरने के लिए प्रोत्साहित किया।’’
लोग स्वेच्छा से गोटा के प्रचार अभियान में योगदान दे रहे हैं और वाहन उपलब्ध करा रहे हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं बड़ी पार्टियों की तरह चुनाव प्रचार में पैसा खर्च नहीं कर सकता। मेरे पास कुछ बचत है जो काम आई है।’’ गोटा ने क्षेत्र में युवाओं का समर्थन हासिल करने का भरोसा जताया।
उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘भाजपा उम्मीदवार महेश कश्यप एक सांप्रदायिक व्यक्ति हैं और सभी धर्मों को एक साथ नहीं लेकर चलते हैं, जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार कवासी लखमा निष्क्रिय हैं। दोनों पार्टियों ने टिकट देते समय अपने समर्पित कार्यकर्ताओं और नेताओं की अनदेखी की।’’
छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों पर तीन चरणों में 19 अप्रैल, 26 अप्रैल और सात मई को मतदान होगा और मतगणना चार जून को होगी। बस्तर एकमात्र सीट है जिसमें पहले चरण में मतदान होगा।
सत्तारूढ़ भाजपा ने विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के सक्रिय सदस्य रहे एक नए चेहरे कश्यप को मैदान में उतारा है, और कांग्रेस ने विधायक लखमा को टिकट दिया है, जो भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली पिछली कांग्रेस सरकार में मंत्री रह चुके हैं।
भाषा आशीष रंजन
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