Jaggi Murder Mystery: ‘पापा पावर’ का इस्तेमाल.. ‘शैडो सीएम’ बनकर दिखाई रंगबाजी! जानिए अमित जोगी ने क्यों और कैसे करवाई थी रामावतार जग्गी की हत्या? यहां जानिए पूरी इनसाइड स्टोरी

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'पापा पावर' का इस्तेमाल.. 'शैडो सीएम' बनकर दिखाई रंगबाजी! Raipur Ramavtar Jaggi Murder Mystery Kab aur kaise hui

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  • Publish Date - April 6, 2026 / 07:13 PM IST,
    Updated On - April 6, 2026 / 07:13 PM IST

Ramavtar Jaggi Murder Mystery. Image source- IBC24

रायपुरः Ramavtar Jaggi Murder Mystery: छत्तीसगढ़ के चर्चित रामावतार सिंह जग्गी हत्याकांड में लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद आखिरकार बड़ा फैसला सामने आया है। 4 जून 2003 को रायपुर के मौदहापारा इलाके में दिनदहाड़े हुई इस सनसनीखेज हत्या के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य के पहले सीएम अजीत जोगी के बेटे और पूर्व विधायक अमित जोगी को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। यह मामला पिछले करीब 23 वर्षों से न्यायालय में लंबित था और राज्य की राजनीति पर लगातार असर डालता रहा। अदालत के इस फैसले को छत्तीसगढ़ की राजनीति के एक अहम मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।

मौदहापारा में दिनदहाड़े हुई थी हत्या

Ramavtar Jaggi Murder Mystery: दरअसल, 4 जून 2003 को सुबह करीब 11:55 बजे रायपुर के व्यस्त मौदहापारा क्षेत्र में अज्ञात हमलावरों ने कारोबारी रामावतार सिंह जग्गी पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं। इस हमले में उनकी मौत हो गई। घटना के बाद हमलावर फरार हो गए और पूरे प्रदेश में सनसनी फैल गई। शुरुआती जांच में पुलिस ने इसे लूट से जुड़ा मामला बताया, लेकिन जल्द ही यह केस राजनीतिक रंग लेता गया। जग्गी के परिवार और विपक्ष ने इसे सुनियोजित राजनीतिक हत्या करार देते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी पर साजिश रचने का आरोप लगाया।

सीबीआई जांच और लंबी कानूनी लड़ाई

मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपी गई। जांच में अमित जोगी का नाम सामने आया और चार्जशीट दाखिल की गई। हालांकि, 2007 में ट्रायल कोर्ट ने सबूतों के अभाव में अमित जोगी को बरी कर दिया था, जबकि अन्य आरोपियों को सजा सुनाई गई। इस फैसले को चुनौती देते हुए जग्गी परिवार ने हाईकोर्ट का रुख किया, जहां यह मामला वर्षों तक विचाराधीन रहा।

हाईकमान का फैसला और रिश्तों में तल्खी

जग्गी हत्याकांड को 2003 के विधानसभा चुनावों से जोड़कर देखा जाता रहा है। साल 2000 में जब मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ एक नया राज्य बना। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल था कि पहला मुख्यमंत्री कौन होगा? दावेदार कई थे लेकिन सबसे मजबूत दावेदारी मानी जा रही थी विद्याचरण शुक्ल की। विद्याचरण शुक्ल के पिता रविशंकर शुक्ल मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री रहे थे और खुद विद्या चरण शुक्ल इंदिरा गांधी सरकार में कई बार केंद्रीय मंत्री रह चुके थे। राज्य निर्माण के समय आखिरी समय में कांग्रेस आलाकमान ने एक अलग दांव खेला और अजीत जोगी को मुख्यमंत्री बनाया गया।

चुनावी रणनीतिकार माने जाते थे जग्गी

बताया जाता है कि अजीत जोगी को सीएम बनाने के फैसले को विद्याचरण शुक्ल ने कभी स्वीकार नहीं किया। उनके और अजीत जोगी के बीच की दूरी धीरे-धीरे टकराव में बदल गई और यही टकराव 2003 के चुनाव तक आते-आते खुली बगावत बन गया। विद्या चरण शुक्ल कांग्रेस छोड़कर एनसीपी में चले गए और अपने साथ पार्टी के कई मजबूत चेहरे ले गए। इनमें से एक रामवतार जग्गी भी थे। जग्गी कोई साधारण कारोबारी नहीं थे। वह व्यापारी वर्ग के बीच बेहद प्रभावशाली थे और राजनीति में उनका रोल पर्दे के पीछे का था। वह फाइनेंस मैनेज करते थे। नेटवर्क संभालते थे और चुनावी रणनीति में अहम भूमिका निभाते थे। यह माना जाता था कि जग्गी जिस पार्टी के साथ खड़े हो जाएं तो व्यापारी वर्ग का बड़ा हिस्सा उसी दिशा में झुक जाता है। ऐसे में 2003 के चुनाव से ठीक पहले उनका महत्व और भी बढ़ गया था।

शैडो चीफ मिनिस्टर कहे जाते थे अमित जोगी

इसी समय दूसरी तरफ तेजी से एक नाम अमित जोगी उभर रहा था। अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी की पहचान सिर्फ “सीएम का बेटा” नहीं थी। वह एक अलग तरह की राजनीतिक ताकत बन चुके थे। उनका जन्म 1977 में अमेरिका के डलास में हुआ, लेकिन राजनीति उन्होंने छत्तीसगढ़ की चुनी। उन्होंने पढ़ाई की दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से की और वहां से लौटकर उन्होंने सीधे छत्तीसगढ़ की सत्ता के भीतर एंट्री ली। कहा जाता है कि 2000 से 2003 के बीच जब अजीत जोगी मुख्यमंत्री थे। उस दौरान अमित जोगी “शैडो चीफ मिनिस्टर” की तरह काम कर रहे थे। उनके पास कोई आधिकारिक पद नहीं था, लेकिन फैसलों में उनकी भूमिका और दखल लगातार चर्चा में रहता था। अफसरों से लेकर ठेके तक हर जगह उनका नाम जुड़ने लगा था। इसी दौर में छत्तीसगढ़ में “केबल वॉर” भी अपने चरम पर था और आरोप लगे कि राज्यभर के केबल नेटवर्क पर अमित जोगी का प्रभाव था। यही वजह थी कि उन्हें “केबल माफिया” तक कहा जाने लगा। अब 2003 के चुनाव नजदीक थे और विद्या चरण शुक्ल की बगावत कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी थी। ऐसे में राम अवतार सिंह जग्गी उस बगावत की रीढ़ माने जा रहे थे। और फिर 4 जून 2003 को जग्गी की हत्या हो जाती है।
यहीं से कहानी पूरी तरह बदल जाती है।

अमित जोगी का राजनीतिक सफर और विवाद

अमित जोगी ने 2013 में मरवाही सीट से रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज कर अपने राजनीतिक करियर का शिखर छुआ, लेकिन 2014 के अंतागढ़ टेप कांड के बाद उनके करियर में गिरावट शुरू हुई। 7 जनवरी 2016 में कांग्रेस ने उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया। इसके बाद उन्होंने अपने पिता अजीत जोगी के साथ जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसी) का गठन किया। 2018 में उन्होंने 5 सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखाई, लेकिन 2020 में पिता के निधन के बाद अमित जोगी अकेले पड़ गए। 2023 तक आते-आते पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई और उसका वोट शेयर गिरकर मात्र 1.25% रह गया। इस दौरान अमित जोगी लगातार विवादों में घिरे रहे। उनके जन्म को लेकर सवाल उठे। अलग-अलग दस्तावेजों में अलग जन्मतिथि और जन्मस्थान सामने आए। उनकी नागरिकता को लेकर भी कानूनी चुनौतियां आईं। सबसे बड़ा विवाद था उनके अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र को लेकर जिसे कई जांचों के बाद खारिज कर दिया गया। इसी वजह से वह अपनी पारंपरिक सीट मरवाही से चुनाव भी नहीं लड़ पाए।

सजा के बाद अमित ने कही ये बात

हाईकोर्ट के फैसले के बाद अमित जोगी ने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा है कि वे इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। वहीं, दिवंगत रामावतार सिंह जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने इसे “सत्य की जीत” बताया है। इस फैसले ने न केवल एक लंबे समय से चले आ रहे हत्याकांड को न्यायिक निष्कर्ष तक पहुंचाया है, बल्कि छत्तीसगढ़ की राजनीति के एक पूरे दौर पर भी विराम लगा दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह निर्णय राज्य की राजनीतिक धारा और जनविश्वास पर गहरा प्रभाव डालेगा।

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