नई दिल्लीः Vande Bharat: बकरीद का त्योहार नजदीक आते ही देश में कुर्बानी और गोवंश को लेकर एक नया सियासी और कानूनी घमासान छिड़ गया है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक बड़े फैसले में साफ कहा कि बकरीद पर गाय की कुर्बानी इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है, लेकिन इस अदालती निर्देश के बाद नेताओं और धार्मिक गुरुओं के बयानों ने देश का राजनीतिक पारा गरमा दिया। कोई हर हाल में कुर्बानी देने की जिद पर अड़ा है, तो कोई गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग कर रहा है।
Vande Bharat: बकरीद से ठीक पहले पश्चिम बंगाल सरकार की पशु वध संबंधी गाइडलाइन पर रोक लगाने से कलकत्ता हाईकोर्ट ने साफ इनकार कर दिया। बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए ऐतिहासिक टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि ईद-उल-जुहा यानी बकरीद पर गाय की कुर्बानी देना इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं, लेकिन आम जनता उन्नयन पार्टी के प्रमुख और विधायक हुमायूं कबीर ने बगावती तेवर अपना लिए हैं। इस विवाद की गूंज देश की राजधानी दिल्ली तक भी सुनाई दी। जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरा और कहा कि बहुसंख्यक आबादी गाय को मां का दर्जा देती है, इसलिए सरकार को इसे तुरंत ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित कर देना चाहिए ताकि धर्म के नाम पर होने वाली मॉब लिंचिंग और मुसलमानों को बदनाम करने की राजनीति पर हमेशा के लिए पूर्णविराम लग सके।
तनाव और बयानों के इस माहौल के बीच समाजवादी पार्टी ने देश में भाईचारा बनाए रखने और बहुसंख्यक समाज की भावनाओं का सम्मान करने की वकालत की है..सपा नेता एसटी हसन ने साफ शब्दों में कहा है कि यदि किसी मजहबी अमल से दूसरे धर्म के लोगों की भावनाएं आहत होती हैं, तो उससे हर हाल में बचना चाहिए। बहरहाल, अदालती आदेश, हुमायूं कबीर की जिद, अरशद मदनी की मांग और सपा की नसीहत के बीच बकरीद से पहले सियासी पारा सातवें आसमान पर है। अब देखना ये होगा कि प्रशासन अदालती आदेशों का पालन कराने में कितना कामयाब हो पाता है।