नयी दिल्ली, 26 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि कोई अपीलीय अदालत यदि किसी आपराधिक मामले में पहली बार किसी आरोपी को दोषी ठहराती है, तो उसे सजा के बिंदुओं पर आरोपी का पक्ष भी सुनना होगा और ऐसे मामले को निचली अदालत के पास नहीं भेजा जा सकता।
न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने यह टिप्पणी दुष्कर्म के एक मामले में दोषसिद्धि से जुड़े प्रकरण को नए सिरे से विचार के लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय को वापस भेजते हुए की।
पीठ ने कहा, ‘‘जो अदालत किसी आरोपी को पहली बार दोषी ठहराती है, उसे सजा के बिंदुओं पर आरोपी की बात भी सुननी होगी। यदि वह निचली अदालत है, तो सीआरपीसी की धारा 235(2) लागू होगी। यदि अपीलीय अदालत आरोपी को बरी किये जाने के फैसले को पलटते हुए पहली बार दोषी ठहराती है, तो अपीलीय अदालत को भी सजा के प्रश्न पर दोषी की बात सुननी होगी।’’
पीठ ने कहा, ‘‘अपीलीय अदालत, दोषसिद्धि के बाद केवल सजा सुनाने के उद्देश्य से मामले को निचली अदालत को नहीं भेज सकती। ऐसा करना सीआरपीसी की धारा 386(ए) तथा इस अदालत के निर्णयों के विपरीत होगा।’’
इस मामले में, उच्च न्यायालय ने आरोपी को दोषी ठहराने के बाद, सजा पर सुनवाई के लिए तारीख तय करने के बजाय, उसे निचली अदालत के न्यायाधीश के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
इसमें यह भी निर्देश दिया गया कि उसके आत्मसमर्पण करने पर ‘निचली अदालत के न्यायाधीश’ उसे हिरासत में ले सकते हैं और कानून के अनुसार, सजा के बिंदुओं पर सुनवाई के बाद भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत उचित सजा सुना सकते हैं।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अपीलीय अदालत को केवल सजा सुनाने के उद्देश्य से मामले को निचली अदालत में नहीं भेजना चाहिए, खासकर तब जब वह आरोपी को दोषी पाता है।
भाषा शोभना सुरेश
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