(वर्षा सागी)
नयी दिल्ली, 22 अप्रैल (भाषा) असोला भाटी वन्यजीव अभयारण्य में संरक्षण प्रयासों के लिए अस्पष्ट वन्यजीव अनुमानों पर निर्भरता जल्द ही एक अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण में तब्दील हो सकती है, क्योंकि दिल्ली वन विभाग द्वारा अनुमोदित 10 वर्षीय प्रबंधन योजना के तहत ‘कैमरा ट्रैप’ आधारित अध्ययन और पहली बार पक्षी तथा तितली सर्वेक्षण शुरू किए जाएंगे।
राष्ट्रीय राजधानी का एकमात्र वन्यजीव अभयारण्य दक्षिणी रिज के किनारे 32.71 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में स्थित है, जहां विभिन्न प्रकार के पक्षी, जानवर और पौधे पाए जाते हैं।
इस संबंध में एक अधिकारी ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) की सहायता से 2024-25 से 2034-35 तक की 10 वर्षीय प्रबंधन योजना तैयार की गई थी और इसे पिछले वर्ष दिसंबर में मंजूरी दी गई थी।’’
उन्होंने कहा कि पूर्ववर्ती योजना वन अनुसंधान संस्थान के सहयोग से तैयार की गई थी।
अधिकारी ने दस्तावेज का हवाला देते हुए कहा कि इस योजना में स्तनधारियों, पक्षियों, तितलियों, भूमि, मिट्टी और जल का विस्तृत वैज्ञानिक मूल्यांकन शामिल होगा, जो भविष्य में संरक्षण उपायों का मार्गदर्शन करेगा।
सूत्रों ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि अभयारण्यों के प्रमुख प्रास क्षेत्रों में 2024 में किए गए पहले व्यवस्थित पक्षी सर्वेक्षण में ‘लाइन ट्रांससेक्ट’ और ‘पॉइंट काउंट’ का उपयोग करते हुए 46 परिवारों की 121 प्रजातियां दर्ज की गई हैं।
सूत्र के अनुसार, सितंबर और नवंबर 2024 के बीच पथरीले क्षेत्रों, मिश्रित वृक्षारोपण, प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा-प्रधान क्षेत्रों और खुले क्षेत्रों में किए गए तितली सर्वेक्षण में ‘लाइन-ट्रांसेक्ट’ और अवसर अनुकूल तरीकों का उपयोग करते हुए 39 वंशों और पांच परिवारों से संबंधित 53 प्रजातियों को प्रलेखित किया गया है, जिनकी पहचान फील्ड गाइड और फोटोग्राफिक रिकॉर्ड के माध्यम से की गई है।
अधिकारी ने बताया कि अप्रैल से जून 2024 के बीच व्यवस्थित ‘कैमरा ट्रैपिंग’ और क्षेत्र सर्वेक्षण का उपयोग करते हुए स्तनधारियों का सर्वेक्षण किया गया, जिसमें लगभग 23 प्रजातियां दर्ज की गईं जिनमें 18 जंगली और पांच आवारा या घरेलू जानवर शामिल थे। विविधता, संख्या और पर्यावास उपयोग का आकलन करने के लिए घनी झाड़ियों, खुले जंगलों, पथरीले इलाकों, वृक्षारोपण क्षेत्रों और घास के मैदानों जैसे विभिन्न पर्यावासों में 20 से अधिक ‘कैमरा ट्रैप’ लगाए गए थे।
वर्ष 2024 के ‘लैंडसैट-8 इमेजरी’ के पर्यवेक्षित वर्गीकरण पर आधारित एक अन्य आकलन से पता चला है कि असोला भाटी वन्यजीव अभयारण्य में प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा (विलायती कीकर) की भरमार है, जो क्षेत्र के 63.48 प्रतिशत हिस्से में है। इसके बाद निर्मित क्षेत्र 14.07 प्रतिशत और वन वृक्षारोपण क्षेत्र 5.46 प्रतिशत है।
अधिकारियों ने बताया कि इस योजना में विलायती कीकर पर चरणबद्ध नियंत्रण, खनन और पथरीले क्षेत्रों में देशी वनस्पतियों के पुनरुत्पादन में सहायता, सूखा झेलने वाले वृक्षों का विस्तार, भूमि उपयोग और वनस्पति परिवर्तन की आवधिक निगरानी तथा देशी वनस्पतियों को बनाए रखने के लिए मिट्टी की नमी बनाए रखने वाली संरचनाओं के साथ-साथ पहाड़ी ढलानों की सुरक्षा जैसे उपाय शामिल होंगे।
उन्होंने कहा कि योजना में यह भी सुझाव दिया गया है कि मकाक बंदरों को कृत्रिम रूप से भोजन देने की लंबे समय से चली आ रही प्रथा को भी धीरे-धीरे समाप्त कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह उनके प्राकृतिक भोजन खोजने के व्यवहार को बाधित करता है और निर्भरता पैदा करता है, साथ ही साथ बार-बार वित्तीय बोझ भी डालता है।
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