नयी दिल्ली, छह जुलाई (भाषा) गूगल और मेटा ने दिल्ली उच्च न्यायालय से कहा है कि वे पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की उस याचिका से जुड़ी अदालत की सुनवाई के वीडियो क्लिप के अनधिकृत प्रकाशन और प्रसार के खिलाफ स्वतः पहल करके निगरानी रखने और कार्रवाई करने में सक्षम नहीं हैं, जिसमें उन्होंने शराब नीति मामले में न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा से स्वयं को सुनवायी से अलग करने का अनुरोध किया था।
यूट्यूब का संचालन करने वाली गूगल एलएलसी और फेसबुक एवं इंस्टाग्राम का संचालन करने वाली मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक ने वकील वैभव सिंह की याचिका पर अपने हलफनामे दाखिल किए हैं। वैभव सिंह ने 13 अप्रैल को हुई अदालत की कार्यवाही की अनधिकृत रिकॉर्डिंग और उसके साझा किए जाने के खिलाफ याचिका दायर की है।
जनहित याचिका में आम आदमी पार्टी के नेताओं अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह सहित अन्य के खिलाफ उच्च न्यायालय के नियमों का उल्लंघन करते हुए क्लिप को कथित तौर पर अपलोड करने और साझा करने के लिए अवमानना कार्यवाही का अनुरोध किया गया है।
न्यायमूर्ति वी. के. राव और न्यायमूर्ति मनमीत पी.एस. अरोड़ा की पीठ ने सोमवार को मामले की सुनवाई 27 अगस्त के लिए स्थगित कर दी और कहा कि केजरीवाल, सिसोदिया और कुछ अन्य नेताओं को अभी तक नोटिस तामील नहीं हुई है।
इस मामले में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, आप नेता संजीव झा, मुकेश अहलावत और जरनैल सिंह तथा पत्रकार रवीश कुमार भी प्रतिवादी हैं।
दोनों अमेरिकी टेक कंपनियों ने इस मामले में अपने हलफनामे दाखिल करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा याचिका में चिह्नित की गई सामग्री अब उपलब्ध नहीं है, लेकिन वे इस सामग्री के दोबारा सामने आने पर स्वतः पहल करके निगरानी नहीं रख सकती।
कंपनियों ने अपने हलफनामों में कहा कि जब भी किसी विशेष गैरकानूनी सामग्री की शिकायत की जाती है या अदालत का कोई निर्देश होता है, तो ऐसी सामग्री को कानून के अनुसार हटा दिया जाता है, लेकिन किसी भी सामग्री पर स्वतः पहल करके निगरानी रखने और कार्रवाई करने का कंपनी पर कोई कानूनी दायित्व नहीं है।
मेटा ने कहा कि वह “सुपर सेंसर” की भूमिका नहीं निभा सकती। उसने कहा, ‘‘दुनिया भर में फेसबुक सर्विस के 2.9 अरब से अधिक उपयोगकर्ता हैं। इसके अलावा, दुनिया भर में इंस्टग्राम सर्विस के एक अरब से अधिक उपयोगकर्ता हैं। साथ ही, हर दिन फेसबुक सर्विस और इंस्टाग्राम सर्विस पर अरबों कंटेंट पोस्ट और साझा किए जाते हैं।’’
उसने कहा, ‘‘इसलिए, फेसबुक या इंस्टाग्राम सर्विस पर कथित तौर पर पोस्ट किए गए विवादित कंटेंट का यूआरएल के बिना पता लगाना या उसकी पहचान करना मेटा के लिए (अगर असंभव नहीं तो) अव्यावहारिक है।’’
मेटा ने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 और उच्चतम न्यायालय का एक निर्णय उसे कानूनी जिम्मेदारी से छूट प्रदान करते हैं। इसने कहा कि कंपनी को तब तक जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि वह किसी वैध अदालती आदेश या अधिसूचित एजेंसी के निर्देश के माध्यम से विवादित सामग्री की ‘वास्तविक जानकारी’ मिलने के बावजूद उसे हटाने के आदेश का पालन करने में विफल न रहे।
इसी तरह गूगल ने कहा कि यूट्यूब एक गतिशील मंच है, जहां हर घंटे दुनिया भर से लाखों वीडियो अपलोड होते हैं, ऐसे में सभी वीडियो की स्वतः निगरानी करना और यह तय करना कि कौन सी सामग्री कानूनी रूप से आपत्तिजनक है, संभव नहीं है।
पत्रकार रवीश कुमार ने अपने जवाब में कहा कि उन्होंने संबंधित वीडियो अपलोड नहीं किए और अधिकतम आरोप यह है कि उन्होंने पहले से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री को साझा या उस पर टिप्पणी की थी, जिसे कई राजनीतिक व्यक्तियों और सामाचार संगठनों ने व्यापक रूप से फैलाया था।
अवमानना याचिका को खारिज किए जाने का अनुरोध करते हुए उन्होंने कहा कि ‘एक्स’ पर उनकी पोस्ट केवल ‘‘पत्रकारिता संबंधी रिपोर्टिंग/टिप्पणी’’ थी और उसमें उच्च न्यायालय की न्यायाधीश के खिलाफ कोई मानहानिकारक टिप्पणी नहीं थी।
उच्च न्यायालय ने 23 अप्रैल को कहा था कि अदालत की कार्यवाही की अनधिकृत रिकॉर्डिंग और प्रकाशन/प्रसारण उच्च न्यायालय के नियमों के तहत प्रतिबंधित है और सोशल मीडिया मंचों से क्लिप को हटाना सुनिश्चित करने पर उनका पक्ष मांगा था।
याचिका में दावा किया गया है कि कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह सहित आम आदमी पार्टी (आप) के कई नेताओं और विभिन्न विपक्षी दलों के सदस्यों ने 13 अप्रैल को न्यायमूर्ति शर्मा के समक्ष अरविंद केजरीवाल की पेशी के वीडियो ‘‘जानबूझकर और सुनियोजित तरीके से रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया पर प्रसारित किए’’, ताकि आम लोगों की नजर में अदालत की छवि धूमिल की जा सके।
इसलिए याचिका में प्रतिवादियों के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू करने और संबंधित सामग्री को सोशल मीडिया से हटाने का अनुरोध किया गया है।
बीस अप्रैल को न्यायमूर्ति शर्मा ने शराब नीति मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग करने से इनकार करते हुए कहा था कि किसी पक्षकार को बिना किसी ठोस आधार के किसी न्यायाधीश पर सवाल उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा था कि न्यायाधीश किसी पक्षकार की निराधार पक्षपात संबंधी आशंका को दूर करने के लिए सुनवाई से स्वयं को अलग नहीं कर सकते।
इसके बाद न्यायमूर्ति शर्मा ने अपने खिलाफ सोशल मीडिया पर की गई कथित ‘‘अपमानजनक’’ टिप्पणियों को लेकर अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के बाद मामले को दूसरी पीठ को भेज दिया था।
स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की गई अवमानना की कार्यवाही उच्च न्यायालय में लंबित है।
भाषा अमित सुरेश
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