नयी दिल्ली, 17 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि चुनावी प्रक्रिया में काला धन लोकतंत्र, कानून के शासन और खुद चुनावी प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाता है।
शीर्ष अदालत ने इसी के साथ देश में चुनावों के दौरान काले धन की बरामदगी से जुड़े आपराधिक मामलों की समय पर जांच और उनका यथाशीघ्र निस्तारण की जरूरत को रेखांकित किया।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन के सिंह की पीठ ने कई निर्देश जारी करते हुए कहा, ‘‘कोई भी बाहरी कारक जो चुनाव की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है, उसमें लोकतंत्र के मूल स्वरूप को ही खतरे में डालने की क्षमता होती है।’’
पीठ ने कहा कि अगर काला धन शामिल हो, तो व्यक्ति का चुनाव स्वतंत्र नहीं होता; बल्कि यह पैसे या किसी और तरह के लाभ, या कभी सच्चे तो कभी गुमराह करने वाले वादों से प्रभावित होता है।
न्यायालय ने कहा,‘‘चुनाव प्रक्रिया में काला धन यानी वह मुद्दा जिस पर हम यहां बात कर रहे हैं, एक ऐसा पहलू है जो लोकतंत्र, कानून के शासन और खुद चुनाव प्रक्रिया को कमजोर करता है।’’
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि लोकतंत्र की सबसे अहम प्रक्रिया को दूषित करने वाले काले धन का चलन कोई नयी बात नहीं है और इसे बार-बार पहचाना गया है।
पीठ ने चुनाव प्रक्रिया के दौरान नकदी और संपत्ति जब्त किए जाने के मामलों का संदर्भ देते हुए कहा, ‘‘ज़ब्ती करने वाले अधिकारी को 24 घंटे के भीतर जिला मजिस्ट्रेट/अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट/अधिकार-क्षेत्र वाली अदालत को इसकी रिपोर्ट देनी होगी। साथ ही, जब्त की गयी नकदी या अन्य संपत्ति और संदिग्ध चुनावी अपराध के बीच प्रथम दृष्टया संबंध बताते हुए लिखित कारण भी देने होंगे।’’
पीठ की ओर से लिखे फैसले में न्यायमूर्ति करोल ने कहा कि जब प्राथमिकी दर्ज की जाती है, तो जांच अधिकारी की कोशिश इस प्रक्रिया को एक साल के भीतर पूरी करने की होनी चाहिए।
न्यायालय ने निर्देश दिया, ‘‘अगर इस समय-सीमा से ज़्यादा समय लगता है, तो इसके कारणों को दर्ज किया जाएगा और भारत के निर्वाचन आयोग को सूचित किया जाएगा।’’
न्यायालय ने यह आदेश कर्नाटक सरकार की उस याचिका पर दिया जो 2014 के लोकसभा चुनावों से जुड़ी थी, जब बेल्लारी जिले में चुनाव के दौरान भारी मात्रा में काला धन जब्त किया गया था।
निर्वाचन आयोग और राज्य सरकारों से 18 नवंबर तक अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश देते हुए पीठ ने कहा कि जांच अधिकारी को संबंधित जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक या पुलिस उपायुक्त की मंज़ूरी के बाद, नोडल अधिकारी के ज़रिए जांच के बारे में तिमाही वस्तु स्थिति रिपोर्ट निर्वाचन आयोग को सौंपनी होगी।
शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि जब अचल निगरानी टीम (एसएसटी) जांच के दौरान 10 लाख रुपये से अधिक की नकदी जब्त करती है तो इसकी जानकारी आयकर अधिकारियों को दी जानी चाहिए।
पीठ ने लोकतंत्र में चुनावों की अहमियत का जिक्र करते हुए कहा कि जो लोग खुद चुनाव लड़ रहे हैं, वे ही चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार नहीं हो सकते।
न्यायालय ने कहा, ‘‘ अगर ऐसा होता है, तो चुनाव का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।’’
पीठ ने साथ ही निर्देश दिया कि बार-बार चुनाव होने की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, उम्मीदवारों और मौजूदा सांसदों/विधायकों के खिलाफ मामलों को जल्द से जल्द निपटाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए।
पीठ ने मुकदमों की सुनवाई जल्द पूरा करने के लिए उच्च न्यायालयों को निर्देश दिया कि वे तय प्रक्रियाओं का पालन करें और ऐसे मामलों की जल्द सुनवाई और निपटारे के लिए विशेष अदालतें तय करें।
न्यायालय द्वारा पूर्व में दिये गए निर्णयों का संदर्भ देते हुए पीठ ने कहा, ‘‘किसी खास चुनाव चक्र में उम्मीदवारों के खिलाफ मामले वापस लेने के लिए संबंधित उच्च न्यायालय की मंजूरी आवश्यक है।’’
पीठ ने कहा कि निर्वाचन आयोग के हलफनामे में 2019-25 के बीच हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों से जुड़े लंबित मामलों की जानकारी दी गई है, जिससे ज्ञात होता है कि लंबित मामलों का प्रतिशत काफी अधिक है।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संबंधित अदालतों को मामलों को यथाशीघ्र तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए।’’
भाषा धीरज अविनाश
अविनाश