आबकारी मामले में अपमानजनक पोस्ट के लिए अवमानना कार्यवाही शुरू की जाएगी: न्यायमूर्ति शर्मा

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आबकारी मामले में अपमानजनक पोस्ट के लिए अवमानना कार्यवाही शुरू की जाएगी: न्यायमूर्ति शर्मा

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  • Publish Date - May 14, 2026 / 05:15 PM IST,
    Updated On - May 14, 2026 / 05:15 PM IST

नयी दिल्ली, 14 मई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायाधीश स्वर्ण कांता शर्मा ने बृहस्पतिवार को कहा कि वह उनके संबंध में अपमानजनक और मानहानिकारक सामग्री पोस्ट करने वाले लोगों के खिलाफ अवमानना ​​​​की कार्यवाही शुरू करेंगी और इस संबंध में वह ‘‘चुप नहीं रह सकती।’’

न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि मानहानिकारक सामग्री पोस्ट करने वाले आबकारी नीति मामले में बरी किये गये कुछ लोगों के खिलाफ वह यह कार्यवाही करेंगी।

न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि वह इस संबंध में शाम लगभग पांच बजे आदेश सुनाएंगी।

उन्होंने कहा, ‘‘मुझे यह जानकारी मिली है कि कुछ प्रतिवादियों द्वारा मेरे और इस न्यायालय के विरुद्ध बहुत अपमानजनक, निंदनीय और मानहानिकारक सामग्री पोस्ट की जा रही है और मैं चुप नहीं रह सकती। मैंने कुछ प्रतिवादियों और कुछ अन्य लोगों के खिलाफ अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू करने का निर्णय लिया है।’’

अदालत शराब नीति मामले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और 21 अन्य को बरी करने के निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली सीबीआई की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

इससे पहले अदालत ने आम आदमी पार्टी के नेताओं केजरीवाल, सिसोदिया और दुर्गेश पाठक का प्रतिनिधित्व करने के लिए वरिष्ठ वकीलों को न्यायमित्र के रूप में नियुक्त करने का फैसला किया था।

सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि कुछ वरिष्ठ वकीलों ने अदालत की सिफारिश को ‘‘स्वीकार’’ कर लिया है, लेकिन इसी बीच उन्हें अवमानना ​​से संबंधित सामग्री मिली।

दिल्ली की एक अदालत ने 27 फरवरी को केजरीवाल, सिसोदिया और 21 अन्य लोगों को शराब नीति मामले में बरी कर दिया था और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से नाराजगी जताते हुए कहा कि उसका मामला न्यायिक समीक्षा में खरा उतरने में पूरी तरह विफल रहा।

न्यायमूर्ति शर्मा ने 20 अप्रैल को आबकारी नीति मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने से इनकार करते हुए केजरीवाल, सिसोदिया और अन्य लोगों की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया था।

न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा था कि किसी भी वादी को बिना किसी सबूत के न्यायाधीश पर फैसला करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है, और न्यायाधीश किसी वादी के पूर्वाग्रह के निराधार डर को दूर करने के लिए खुद को मामले से अलग नहीं कर सकते हैं।

पाठक, विजय नायर और अरुण रामचंद्र पिल्लई ने भी न्यायाधीश को मामले से अलग करने के लिए आवेदन दायर किए थे।

भाषा

देवेंद्र नरेश

नरेश