नैनीताल, एक जुलाई (भाषा) उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 12 साल पुराने एक मामले में निचली अदालत द्वारा दी गयी फांसी की सजा के संबंध में सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को रिकॉर्डों का परीक्षण करने और यह स्पष्ट करने के निर्देश दिए कि अपराध के समय क्या आरोपी किसी गंभीर मानसिक बीमारी से पीड़ित था।
न्यायमूर्ति रवींद्र मैंठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने राज्य सरकार को यह बताने को भी कहा है कि फांसी की सजा सुनाए जाते समय कोई प्रासंगिक पहलू नजरअंदाज तो नहीं हुआ।
अदालत ने मामले की सुनवाई की अगली तारीख 21 जुलाई निर्धारित की।
निचली अदालत ने एक ऐसे व्यक्ति को फांसी की सजा सुनायी थी जिसने अपनी मां, बड़े भाई और गर्भवती भाभी की तलवार से बेरहमी से हत्या कर दी थी। उच्च न्यायालय ने आरोपी की मानसिक स्थिति पर फिर से विचार करने के लिए मामले को निचली अदालत के पास दोबारा भेजा था।
नये सिरे से सुनवाई के बाद निचली अदालत ने आरोपी की फांसी की सजा बरकरार रखी। अदालत ने माना कि घटना के समय आरोपी मानसिक रूप से ठीक था और पिछले आदेश में बदलाव करने का कोई आधार नहीं है।
अभियोजन के अनुसार, टिहरी गढ़वाल जिले के गुमाल गांव निवासी संजय सिंह ने 13 दिसंबर 2014 को एक मामूली विवाद के दौरान अपनी मां, बड़े भाई और गर्भवती भाभी की तलवार से हत्या कर दी थी। इस संबंध में उसके पिता राम सिंह पवार ने प्राथमिकी दर्ज कराई थी।
अगस्त 2021 में अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत ने संजय को फांसी की सजा सुनाई थी जिसके बाद उसने इस निर्णय को उच्च न्यायालय में इस अधार पर चुनौती दी कि उसकी मानसिक बीमारी पर ठीक से विचार नहीं किया गया।
उच्च न्यायालय ने आरोपी का पक्ष रखने के लिए वरिष्ठ वकील अरविंद वशिष्ठ को ‘न्याय मित्र’ नियुक्त किया। न्याय मित्र ने कहा कि फांसी की सजा पाए दोषी की मानसिक हालत ठीक नहीं थी। उन्होंने एक मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि आरोपी मानसिक बीमारी से पीड़ित था और उस समय अपने कृत्यों के नतीजों को समझने में असमर्थ था, हालांकि उसकी बीमारी का इलाज संभव था।
दलील दी गयी कि इस मेडिकल राय के बावजूद निचली अदालत ने सबूतों को नज़रअंदाज़ किया और मौत की सज़ा सुनाई।
भाषा सं दीप्ति अमित
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