कोलकाता, 22 अप्रैल (भाषा) कलकत्ता उच्च न्यायालय ने बुधवार को निर्वाचन आयोग के पुलिस पर्यवेक्षक के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें उन्होंने कई नागरिकों को ‘‘उपद्रवी’’ करार दिया था और उनके खिलाफ कार्रवाई का निर्देश दिया था।
एक जनहित याचिका पर कार्रवाई करते हुए एक खंडपीठ ने माना कि पुलिस पर्यवेक्षक ने ‘‘कई नागरिकों को उपद्रवी मानकर एक सामान्य निर्देश जारी करने में गलती की है’’।
याचिका में दावा किया गया था कि कई लोगों को उपद्रवी मानने के आदेश से नागरिकों के स्वतंत्रता संबंधी मौलिक अधिकार प्रभावित होंगे।
मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने 21 अप्रैल के आदेश के क्रियान्वयन पर 30 जून तक रोक लगा दी।
हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यह आदेश नागरिक/पुलिस अधिकारियों को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 या किसी अन्य कानून के तहत अपराध के मामले में कार्यवाही करने से नहीं रोकेगा।
याचिकाकर्ता के वकील कल्याण बनर्जी ने अदालत में बताया कि पुलिस पर्यवेक्षक के ज्ञापन में कहा गया है, ‘‘विभिन्न स्रोतों से यह देखा गया है कि जिन व्यक्तियों के नाम संलग्न सूची (अनुलग्नक ए) में उल्लिखित हैं, वे अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों/पुलिस थाना क्षेत्रों में मतदाताओं को डराने-धमकाने और चुनावी प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करने में सक्रिय रूप से शामिल हैं।’’
तृणमूल कांग्रेस के सांसद बनर्जी ने अदालत के समक्ष दावा किया कि सूची में लगभग 800 लोगों के नाम हैं और इनमें से कई व्यक्ति निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, जैसे सांसद, विधायक, पार्षद और पंचायत एवं नगरपालिकाओं के सदस्य।
खंडपीठ ने निर्देश दिया कि मामले की सुनवाई पांच सप्ताह बाद फिर से होगी।
भाषा नेत्रपाल अविनाश
अविनाश