नयी दिल्ली, एक जुलाई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने राज्यसभा सदस्य राघव चड्ढा को निशाना बनाने वाली कुछ आपत्तिजनक सोशल मीडिया सामग्री को बुधवार को हटाने का निर्देश दिया।
अदालत ने फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि किसी सार्वजनिक हस्ती को बहुत ज्यादा संवेदनशील नहीं होना चाहिए और अपने फैसले की आलोचना पर शिकायत नहीं करनी चाहिए।
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने चड्ढा द्वारा चिह्नित ‘अधिकतर’ सामग्री को हटाने का आदेश देने से इनकार करते हुए कहा कि व्यंग्यात्मक हास्य के रूप में की गई आलोचना अपने-आप में आपत्तिजनक या मानहानिकारक नहीं हो जाती।
न्यायमूर्ति ने टिप्पणी की, ‘‘किसी सार्वजनिक व्यक्ति को अपने फैसलों की आलोचना पर शिकायत करने के लिए इतना संवेदनशील नहीं होना चाहिए और ऐसी आलोचना को विनम्रता से देखा जाना चाहिए।’’
आम आदमी पार्टी (आप) छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हुए चड्ढा ने इससे पूर्व कथित तौर पर दुर्भावनापूर्ण और मनगढ़ंत सोशल मीडिया पोस्ट के प्रकाशन के खिलाफ उच्च न्यायालय में मुकदमा दायर किया था। उन्होंने कहा था कि ये पोस्ट उनकी प्रतिष्ठा और उनके व्यक्तित्व के अधिकारों के लिए बेहद नुकसानदेह थीं।
न्यायमूर्ति प्रसाद ने अंतरिम आदेश में कहा कि याचिका के साथ संलग्न कुछ सामग्री में दुर्भावना प्रभाव था और चड्ढा की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया गया था, लेकिन ‘‘अधिकतर’’ सामग्री में ‘‘याची के राजनीतिक क्षेत्र में लिये गए फैसले को लेकर तंज कसा’’ गया था।
अदालत ने पाया कि जिन पोस्ट को चुनौती दी गई थी, उनमें स्पष्ट तौर पर अश्लील और अभद्र सामग्री थी, जो ‘‘हानिरहित व्यंग्यात्मक हास्य’’ के दायरे में नहीं आते। एकल पीठ ने सोशल मीडिया मंचों को निर्देश दिया कि वे अगले आदेश तक दो हफ्ते के भीतर उक्त पोस्ट को हटा दें।
अदालत ने सोशल मीडिया मंचों को निर्देश दिया कि वह चड्ढा को उक्त सामग्री से जुड़े खातों की ‘‘बेसिक सब्सक्राइबर इन्फॉर्मेशन’ और ‘आईपी लॉग्स’ उपलब्ध कराएं।
न्यायमूर्ति प्रसाद ने 19 पन्नों के आदेश में कहा कि राजनीतिक फैसलों पर ‘‘प्रशंसा और आलोचना, दोनों ही मिल सकती हैं’’ और राजनीतिक दलों के गठबंधन आदि को लेकर मखौल राजनीति का ही एक हिस्सा है।
आदेश के मुताबिक, ‘‘किसी भी राजनीतिक दल के नेता की किसी भी गतिविधि से – ज़्यादातर मामलों में, या कहें कि लगभग हर स्थिति में – आम जनता या विरोधी दलों के सदस्यों द्वारा आलोचना हो सकती है, वे नाराज हो सकते हैं या उनमें असहजता पैदा हो सकती है। कभी-कभी उक्त गतिविधि की प्रतिक्रिया व्यंग्यात्मक रूप में भी सामने आ सकती है। हालांकि, इसका अभिप्राय यह नहीं है कि ऐसी सामग्री स्वत: आपत्तिजनक या मानहानि करने वाली हो जाती है।’’
अदालत ने कहा, ‘‘सार्वजनिक हस्तियों जैसे सत्ता में बैठे लोगों को व्यंग्यात्मक हास्य का निशाना बनने को अपने पेशे का एक जरूरी और अपरिहार्य हिस्सा मानना चाहिए, भले ही यह उन्हें बुरा लगे।’’
अदालत ने रेखांकित किया कि ‘सही संतुलन’ बनाना जरूरी है।
पीठ ने कहा कि वह किसी व्यक्ति की गरिमा को नुकसान पहुंचाने के लिए डीपफेक वीडियो, छेड़छाड़ कर तैयार की गई तस्वीरें और ऐसी ही सामग्री तैयार करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के इस्तेमाल का समर्थन नहीं करती है।
अदालत ने साथ ही माना कि राजनीतिक संदर्भ में सोशल मीडिया मंचों पर अपनी राय रखने के लिए एआई का इस्तेमाल एक ‘टूल’ के तौर पर किया जा रहा है।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा कि प्रथम दृष्टया यह मुकदमा चड्ढा के व्यक्तित्व से जुड़े अधिकार की सुरक्षा से संबंधित नहीं था। इन अधिकारों में अपनी छवि, नाम और ऐसी ही अन्य चीज़ों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने और उनके गलत इस्तेमाल से बचाने, तथा उनसे होने वाले वाणिज्यिक लाभ पर अधिकार शामिल होता है।
अदालत ने रेखांकित किया कि वादी ने व्यक्तित्व अधिकार संबंधी दलीलों पर जोर नहीं दिया और स्वयं को मानहानि के मामले में ही राहत के अनुरोध तक सीमित किया।
अदालत ने कथित आपत्तिजनक सामग्री हटाने के मामले में अंतरिम राहत देने के अनुरोध पर 21 मई को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
चड्ढा ने अपनी याचिका में सोशल मीडिया मंचों पर बड़े पैमाने पर प्रसारित झूठे, एआई जनित और डीपफेक सामग्री को तत्काल हटाने का निर्देश देने का अनुरोध किया था।
याचिका में दलील दी गई थी कि एआई और डीपफेक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करके बिना अनुमति के सामग्री बनाकर प्रसारित की जा रही है, जो चड्ढा के कानूनी और संवैधानिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है।
ऐश्वर्या राय बच्चन, अभिषेक बच्चन और सलमान खान जैसी कई मशहूर हस्तियों, ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, पत्रकार सुधीर चौधरी, पॉडकास्टर राज शमानी और आंध्र प्रदेश के उप मुख्यमंत्री पवन कल्याण ने भी इससे पूर्व अपने व्यक्तित्व और प्रचार से जुड़े अधिकारों की सुरक्षा के लिए उच्च न्यायालय का रुख किया था। उच्च न्यायालय ने उन्हें अंतरिम राहत दी थी।
भाषा धीरज शफीक
शफीक