सबूतों से खालिद और इमाम की संलिप्तता का पता चलता है: न्यायालय

सबूतों से खालिद और इमाम की संलिप्तता का पता चलता है: न्यायालय

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  • Publish Date - January 5, 2026 / 05:35 PM IST,
    Updated On - January 5, 2026 / 05:35 PM IST

नयी दिल्ली, पांच जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों से पता चलता है कि उमर खालिद और शरजील इमाम 2020 के दिल्ली दंगों की ‘‘साजिश रचने, लामबंदी करने और रणनीतिक दिशा-निर्देश देने’’ में शामिल थे। इसके साथ ही इसने साजिश के मामले में दोनों की जमानत याचिका खारिज कर दी।

शीर्ष अदालत ने यूएपीए की धारा 43डी (5) का हवाला दिया, जिसके अनुसार यदि किसी मामले की डायरी या आरोपपत्र की जांच करने पर न्यायालय को यह विश्वास करने के लिए उचित आधार मिलते हैं कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सही है, तो न्यायालय को जमानत देने से इनकार करना होगा।

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि इस स्तर पर अपेक्षित एवं अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत सामग्री से प्रथम दृष्टया साजिश में उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका का प्रमाण मिलता है।

पीठ ने कहा कि सामग्री से ‘‘साजिश, लामबंदी और रणनीतिक दिशा-निर्देश के स्तर पर भागीदारी का संकेत मिलता है, जो छिटपुट या स्थानीय कृत्यों से कहीं आगे तक फैला है’’।

इसने कहा कि इसके अलावा, यूएपीए की धारा 43डी (5) के तहत यह वैधानिक सीमा इन अपीलकर्ताओं के संबंध में लागू होती है।

गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के प्रावधान के अनुसार, यदि मामले की डायरी या संहिता की धारा 173 के तहत बनाई गई रिपोर्ट का अवलोकन करने पर न्यायालय की यह राय हो कि यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि ऐसे व्यक्ति के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सत्य है, तो ऐसे आरोपी व्यक्ति को जमानत पर या स्वयं के निजी मुचलके पर रिहा नहीं किया जाएगा।

शीर्ष अदालत ने कहा कि जब अभियोजन सामग्री प्रथम दृष्टया अपराध को उजागर करती है, तो वैधानिक प्रतिबंध प्रभावी होना चाहिए, और यदि ऐसा नहीं है, तो स्वतंत्रता प्रभावी होनी चाहिए।

हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को यह कहते हुए जमानत दे दी कि इससे उनके खिलाफ लगे आरोपों की गंभीरता में कोई कमी नहीं आती।

शीर्ष अदालत ने कहा कि यद्यपि यूएपीए मामलों में जमानत देना नियमित प्रक्रिया नहीं है, फिर भी कानून के तहत जमानत देने से इनकार करना अनिवार्य नहीं है और यह कानून जमानत देने के न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को भी सीमित नहीं करता।

इमाम को नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दिए गए भाषणों के लिए 28 जनवरी, 2020 को गिरफ्तार किया गया था। बाद में अगस्त 2020 में उसे एक बड़े षड्यंत्र के मामले में गिरफ्तार किया गया। खालिद को 13 सितंबर, 2020 को गिरफ्तार किया गया था।

दिल्ली पुलिस ने शीर्ष अदालत को बताया था कि खालिद, इमाम और अन्य लोगों ने ‘‘शांतिपूर्ण विरोध’’ की आड़ में ‘‘सत्ता परिवर्तन अभियान’ चलाकर देश की संप्रभुता और अखंडता पर हमला करने की साजिश रची थी।

इसने कहा था कि कथित अपराधों में देश को अस्थिर करने का जानबूझकर प्रयास शामिल था, जिसके लिए ‘‘जमानत नहीं बल्कि जेल’’ की सजा होनी चाहिए। पुलिस ने कहा था कि उसने आरोपियों के खिलाफ प्रत्यक्ष, दस्तावेजी और तकनीकी साक्ष्य एकत्र किए हैं जो सांप्रदायिक आधार पर राष्ट्रव्यापी दंगों को भड़काने में उनकी अंतर्निहित, गहरी और प्रबल संलिप्तता को दर्शाते हैं।

पुलिस ने 900 गवाहों के कारण मुकदमे के पूरा होने की संभावना नहीं होने के तर्क का खंडन करते हुए कहा कि यह बयान न केवल समय से पहले दिया गया है, बल्कि जमानत प्राप्त करने के लिए गढ़ा गया एक ‘‘भ्रमित करने वाला’’ बयान भी है।

इसने दावा किया कि खालिद और इमाम ने जेएनयू के ‘‘धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने’’ को भंग किया और ‘मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑफ जेएनयू’ नाम से एक सांप्रदायिक व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया और उन्हें उकसाने तथा संगठित करने के लिए जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों का भी इस्तेमाल किया।

शीर्ष अदालत ने पिछले साल 10 दिसंबर को दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता एवं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू तथा आरोपियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं कपिल सिब्बल, अभिषेक सिंघवी, सिद्धार्थ दवे, सलमान खुर्शीद एवं सिद्धार्थ लूथरा की दलीलें सुनने के बाद आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों में 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। क्षेत्र में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के खिलाफ व्यापक विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़क उठी थी।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने दंगों की साजिश से जुड़े मामले में उमर सहित अन्य आरोपियों को जमानत देने से दो सितंबर को इनकार कर दिया था। इसके बाद आरोपियों ने उस फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया था।

दिल्ली पुलिस ने जमानत याचिकाओं का जोरदार विरोध करते हुए कहा कि दंगे स्वत: नहीं हुए थे बल्कि ये भारत की संप्रभुता पर एक सुनियोजित, पूर्व-नियोजित और सुव्यवस्थित हमला थे।

राजू ने दलील दी थी कि किसी भी साजिश में शामिल सभी लोग एक-दूसरे के कृत्यों के लिए उत्तरदायी हैं।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि खालिद ने जानबूझकर दंगों से पहले दिल्ली छोड़ने की योजना बनाई थी क्योंकि वह जिम्मेदारी से बचना चाहता था।

भाषा

नेत्रपाल नरेश

नरेश