(अलिंद चौहान)
नयी दिल्ली, 20 मई (भाषा) पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) ने झारखंड के चतरा और लातेहार जिलों में स्थित मगध खुली खदान के विस्तार को मंजूरी दे दी है, जबकि परियोजना से संबंधित वन भूमि पर कथित अतिक्रमण के 11 मामले अदालतों में लंबित हैं।
यह खदान कोल इंडिया लिमिटेड की सहायक कंपनी सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) द्वारा संचालित है और इसने अपनी उत्पादन क्षमता को 2 करोड़ टन प्रति वर्ष (एमटीपीए) से बढ़ाकर 2.4 करोड़ टन प्रति वर्ष करने के लिए पर्यावरण मंजूरी (ईसी) मांगी थी, जिसके तहत खनन पट्टा क्षेत्र को 1,769 हेक्टेयर से घटाकर 1,598.71 हेक्टेयर किया गया है।
इस परियोजना में 628.09 हेक्टेयर वन भूमि शामिल है। इसमें से 276.04 हेक्टेयर भूमि के लिए द्वितीय चरण की वन मंजूरी दी जा चुकी है, लेकिन शेष 352.05 हेक्टेयर भूमि के लिए भूमि हस्तांतरण के वास्ते अंतिम मंजूरी मिलनी अभी बाकी है।
ईएसी की अप्रैल में हुई बैठक के विवरण के अनुसार, ‘‘समिति ने पाया कि वन भूमि पर कथित अतिक्रमण से संबंधित कुछ अदालती मामले इस परियोजना से जुड़े हुए हैं। हालांकि, समिति ने यह भी पाया कि इन मामलों में शामिल वन भूमि परियोजना के स्वीकृत खनन पट्टे क्षेत्र से बाहर हैं।’’
परियोजना प्रस्तावक (पीपी) को वन भूमि के भीतर खनन या संबंधित गतिविधियों को रोकने के लिए ईएसी ने बांस की बाड़ लगाने की सिफारिश की।
इसने यह भी सिफारिश की कि 352.05 हेक्टेयर क्षेत्र में द्वितीय चरण की वन मंजूरी प्राप्त किए बिना कोई खनन गतिविधि नहीं की जानी चाहिए।
लातेहार जिला अदालत में आठ मामले लंबित हैं, जबकि शेष मामले चतरा जिला अदालत में हैं। ये सभी मामले 2019 और 2025 के बीच भारतीय वन अधिनियम, 1927 और भारतीय वन (बिहार संशोधन) अधिनियम, 1989 के तहत दायर किए गए हैं।
‘विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी’ के वरिष्ठ रेजिडेंट फेलो और जलवायु एवं पारिस्थितिकी तंत्र टीम के प्रमुख देबदित्यो सिन्हा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘पर्यावरण संबंधी पूर्वव्यापी स्वीकृतियों पर रोक लगाने के फैसले पर उच्चतम न्यायालय के स्थगन आदेश के बाद, पर्यावरण मंत्रालय द्वारा ऐसी स्वीकृतियां देने का चलन तेजी से आम होता जा रहा है, यहां तक कि उन मामलों में भी, जहां अदालती कार्यवाही लंबित है।’’
उन्होंने कहा कि यह एक गलत उदाहरण स्थापित करता है और पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना, 2006 के प्रावधान के विरुद्ध है।
भाषा
सुभाष मनीषा
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