एफसीआरए विधेयक संयुक्त समिति को भेजा गया, विपक्ष ने की वापस लेने की मांग

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एफसीआरए विधेयक संयुक्त समिति को भेजा गया, विपक्ष ने की वापस लेने की मांग

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  • Publish Date - August 12, 2026 / 05:43 PM IST,
    Updated On - August 12, 2026 / 05:43 PM IST

नयी दिल्ली, 12 अगस्त (भाषा) कई विपक्षी दलों की आलोचना और विभिन्न परमार्थ संगठनों की मांग के बाद बुधवार को विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन (एफसीआरए) विधेयक, 2026 को विस्तृत समीक्षा और संभावित सुझावों के लिए संसद की संयुक्त समिति को भेजा गया।

लोकसभा ने इससे संबंधित प्रस्ताव को मंजूरी दी।

कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (सपा) और द्रमुक ने विधेयक को अल्पसंख्यकों के खिलाफ करार देते हुए इसे वापस लेने की मांग की।

सरकार ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इस विधेयक में एक भी प्रावधान अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं है तथा यह सिर्फ देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने इस विधेयक को संसद की संयुक्त समिति के पास भेजने का प्रस्ताव रखा, जिसे सदन ने विपक्षी सदस्यों के हंगामे के बीच ध्वनिमत से मंजूरी दी।

विधेयक का विरोध करते हुए कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि यह विधेयक गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) और अल्पसंख्यक संस्थानों को निशाना बनाने के लिए लाया गया है।

उन्होंने दावा किया कि सरकार अल्पसंख्यकों को निशाना बना रही है।

वेणुगोपाल ने कहा, ‘‘इस विधेयक को वापस लिया जाए।’’

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि पूरा विपक्ष एफसीआरए विधेयक के खिलाफ है।

उन्होंने विधेयक को अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताया और कहा कि यह सरकार आज तक ऐसा कौन सा विधेयक लाई है जो अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं हो।

द्रमुक नेता टीआर बालू ने भी विधेयक को वापस लेने की मांग की।

अल्पसंख्यक और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया और अखिलेश यादव को यह साबित करने की चुनौती दी कि इस विधेयक में एक भी प्रावधान अल्पसंख्यकों के खिलाफ है।

उन्होंने कहा कि किसी भी समुदाय को निशाना बनाने का सवाल ही नहीं उठता।

रीजीजू का कहना था, ‘‘कांग्रेस और कई विपक्षी दलों ने खुद मांग की थी कि विधेयक को संयुक्त समिति को भेजा जाए और अब जब इसे भेजा जा रहा है तो इस पर आपत्ति क्यों है।’’

उन्होंने कहा कि अगर विपक्ष को विधेयक के किसी बिंदु का विरोध करना है तो वह संयुक्त समिति के समक्ष अपनी बात रख सकता है।

मंत्री ने आरोप लगाया कि विपक्ष कुछ समुदायों को गुमराह करने का प्रयास कर रहा है।

विपक्षी सदस्यों के हंगामे के बीच ही सदन ने ध्वनिमत से इस प्रस्ताव को मंजूरी दी।

इसके बाद पीठासीन सभापति जगदंबिका पाल ने अपराह्न दो बजकर 27 मिनट पर सदन की बैठक तीन बजे तक के लिए स्थगित कर दी।

नियम के अनुसार, इस संयुक्त समिति में 31 सदस्य होंगे, जिनमें लोकसभा से 21 और राज्यसभा से 10 सदस्य शामिल होंगे।

प्रस्ताव में कहा गया है कि समिति वर्ष 2026 के शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह के आखिरी दिन तक लोकसभा को रिपोर्ट सौंपेगी।

सरकार ने इस साल 25 मार्च को लोकसभा में एफसीआरए विधेयक पेश किया था, जिसका मकसद विदेश से अंशदान हासिल करने को पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है।

इस विधेयक में विदेशी वित्त पोषित संगठनों पर निगरानी के साथ यह प्रस्ताव किया गया था कि लाइसेंस गंवाने वाली गैर-लाभकारी संस्थाओं की संपत्तियों को जब्त करने और इनका प्रबंधन करने के लिए एक नया प्राधिकरण बनाया जाएगा।

इसमें विदेशी अंशदान और संपत्तियों के पर्यवेक्षण, प्रबंधन और निपटान के लिए एक व्यापक वैधानिक ढांचे का प्रावधान भी किया गया।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में लगभग 16,000 संगठन अधिनियम के तहत पंजीकृत हैं और उन्हें सालाना लगभग 22,000 करोड़ रुपये मिलते हैं।

विधेयक के उद्देश्यों और कारणों के कथन के अनुसार, प्रस्तावित कानून में पूर्व अनुमति के तहत प्राप्ति और उपयोग के लिए समयसीमा प्रदान करने का प्रावधान किया गया।

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) में धारा 15 संपत्तियों को निहित करने का प्रावधान करती है, लेकिन ऐसी संपत्तियों के पर्यवेक्षण, प्रबंधन और निपटान के लिए एक व्यापक ढांचे की अनुपस्थिति के कारण प्रशासनिक अनिश्चितता और दुरुपयोग की गुंजाइश पैदा हो गई है।

प्रस्तावित कानून के तहत, सरकार ने उन मामलों में विदेशी योगदान से बनाई गई संपत्तियों का अस्थायी या स्थायी नियंत्रण लेने के लिए ‘‘नामित प्राधिकरण’’ स्थापित करने के लिए एक नया अध्याय 3ए पेश किया, जहां विदेशी अंशदान प्रमाण पत्र रद्द कर दिए गए हैं, जिनका आत्मसमर्पण कर दिया गया है या बंद कर दिए गए हैं।

एक मई, 2011 को अधिनियमित विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010, विदेशी अंशदान और विदेशी आतिथ्य की स्वीकृति और उपयोग को नियंत्रित करता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस तरह के धन के प्रवाह से राष्ट्रीय हित, सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। अधिनियम में इससे पहले 2016, 2018 और 2020 में संशोधन किया गया है।

भाषा हक हक वैभव

वैभव