वेधशाला से लोकतांत्रिक विरोध के प्रतीक तक : जंतर-मंतर का ऐसा रहा सफर
वेधशाला से लोकतांत्रिक विरोध के प्रतीक तक : जंतर-मंतर का ऐसा रहा सफर
( वर्षा सागी )
नयी दिल्ली, 24 जुलाई (भाषा) कभी तारों और ग्रहों की गति का अध्ययन करने के लिए बनाई गई वेधशाला जंतर-मंतर और उसके बगल की सड़क आज लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र बन चुकी है। जंतर-मंतर ने अपने लगभग तीन सौ वर्षों के इतिहास में कई रूप देखे हैं।
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (कॉजपा) के जारी आंदोलन में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर ऐतिहासिक जंतर-मंतर का नाम राजधानी के प्रमुख प्रदर्शन स्थल से कैसे जुड़ गया।
वर्तमान में जिस सड़क को विरोध-प्रदर्शनों के लिए जाना जाता है, उसके निकट स्थित जंतर-मंतर का निर्माण वर्ष 1731 में महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने कराया था। यह देश में उनके द्वारा निर्मित पांच वेधशालाओं में से एक है, जिसका उद्देश्य खगोलीय पिंडों की गति का अध्ययन और खगोलीय गणनाओं को अधिक सटीक बनाना था।
इतिहासकार राना सफवी ने अपनी पुस्तक ‘शाहजहानाबाद : द लिविंग सिटी ऑफ ओल्ड दिल्ली’ में लिखा है कि इस वेधशाला में सम्राट यंत्र, जय प्रकाश यंत्र, राम यंत्र और मिश्र यंत्र जैसे पत्थर के विशाल उपकरण हैं, जिनका उपयोग समय मापने, सूर्य एवं ग्रहों की गति का अध्ययन करने और खगोलीय स्थितियों का निर्धारण करने के लिए किया जाता था।
समय के साथ राजधानी के मध्य स्थित इस वेधशाला के आसपास संसद, सरकारी कार्यालयों और कनॉट प्लेस जैसे प्रमुख केंद्र विकसित हुए। इसके चलते इसके निकट की सड़क की पहचान धीरे-धीरे बदलती गई। वैसे जंता-मंतर हमेशा से दिल्ली का मुख्य प्रदर्शन स्थल नहीं था।
स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक राजधानी के बड़े विरोध-प्रदर्शन इंडिया गेट के निकट बोट क्लब मैदान में होते थे। वहीं अनेक संगठन अपनी मांगों को लेकर लाल किले के पीछे कई दिनों या हफ्तों तक डेरा डालते थे।
उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2018 के अपने एक फैसले में उल्लेख किया था कि यह व्यवस्था 1980 के दशक के उत्तरार्ध में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में हुए बड़े किसान आंदोलन के बाद बदलनी शुरू हुई।
सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े कारणों का हवाला देते हुए प्रशासन ने धीरे-धीरे बोट क्लब पर प्रदर्शन सीमित कर दिए और वर्ष 1993 तक जंतर-मंतर रोड को मध्य दिल्ली में धरना-प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान बना दिया गया।
इसके बाद श्रमिक संगठनों, किसानों, छात्रों, पेंशनभोगियों, पूर्व सैनिकों, विस्थापित समुदायों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और न्याय की मांग करने वाले लोगों ने यहां जुटना शुरू किया। देखते ही देखते 18वीं सदी की वेधशाला से लगी यह सड़क देश में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन का सबसे प्रमुख प्रतीक बन गई।
यह व्यवस्था करीब 25 वर्षों तक जारी रही। बाद में जंतर-मंतर रोड के निवासियों ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) का रुख करते हुए शिकायत की कि उनका रिहायशी इलाका स्थायी प्रदर्शन स्थल में बदल गया है। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारी कई-कई सप्ताह और महीनों तक वहां डेरा डालते हैं, अस्थायी ढांचे और तंबू लगाते हैं, ध्वनि विस्तारक यंत्रों का उपयोग करते हैं, कूड़ा छोड़ जाते हैं जिससे सामान्य जीवन प्रभावित होता है।
एनजीटी ने अक्टूबर 2017 में निवासियों की याचिका स्वीकार करते हुए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन रोकने और प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान स्थानांतरित करने का आदेश दिया।
हालांकि, मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस), किसान संगठनों, इंडियन एक्स-सर्विसमेन मूवमेंट और अन्य संगठनों ने इस आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध नागरिकों के शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा। उनका यह भी तर्क था कि संसद और सरकार के केंद्र से दूर प्रदर्शन होने पर उनका प्रभाव कम हो जाएगा और विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर प्रदर्शनकारियों के लिए अपनी आवाज उठाना कठिन हो जाएगा।
तेइस जुलाई 2018 को उच्चतम न्यायालय ने दोनों पक्षों के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करते हुए कहा कि जहां स्थानीय निवासियों को शांत वातावरण और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार है, वहीं नागरिकों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का भी मौलिक अधिकार प्राप्त है। अदालत ने प्रदर्शनों पर पूर्ण रोक लगाने के बजाय उनके नियमन के लिए दिशा-निर्देश बनाने का निर्देश दिया।
वर्तमान व्यवस्था के तहत जंतर-मंतर रोड पर एक हजार लोगों के प्रदर्शन की अनुमति है, जबकि इससे बड़े आयोजनों के लिए रामलीला मैदान निर्धारित किया गया है। साथ ही, प्रदर्शन से पहले पुलिस की अनुमति लेना अनिवार्य किया गया है तथा भीड़ की संख्या, अवधि, स्वच्छता, ध्वनि स्तर, यातायात प्रबंधन, कानून-व्यवस्था और आयोजकों की जिम्मेदारियों से जुड़े दिशा-निर्देश भी तय किए गए हैं।
इतिहासकार सोहैल हाशमी ने कहा कि दिल्ली में सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शनों की परंपरा कई दशकों पुरानी है। उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘1960 के दशक में बोट क्लब से इंडिया गेट तक बड़े-बड़े प्रदर्शन होते थे। वहीं कई प्रदर्शनकारी लाल किले के पीछे तब तक डेरा डाले रहते थे, जब तक कोई मंत्री उनकी मांगें सुनने नहीं आता था।’’
उन्होंने कहा, ‘‘जंतर-मंतर हमेशा लोकतांत्रिक असहमति का प्रतीक रहा है। 1990 के दशक की शुरुआत में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का हवाला देकर सरकार ने विरोध-प्रदर्शनों को अपेक्षाकृत छोटे जंतर-मंतर क्षेत्र तक सीमित कर दिया। लोग विभिन्न मुद्दों पर छोटे समूहों या व्यक्तिगत रूप से वहां प्रदर्शन करते रहे।’’
कॉजपा के मौजूदा आंदोलन का उल्लेख करते हुए हाशमी ने कहा कि इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका व्यापक स्वरूप और लंबी अवधि है। उन्होंने कहा, ‘‘हाल के दशकों में जंतर-मंतर पर इतने बड़े पैमाने पर और इतने लंबे समय तक चलने वाला आंदोलन पहले कभी देखने को नहीं मिला।’’
करीब तीन शताब्दियों पहले महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा निर्मित जंतर-मंतर आज भी वैज्ञानिक जिज्ञासा और खगोलीय अध्ययन का प्रतीक है। वहीं, इसके निकट स्थित सड़क लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का ऐसा मंच बन चुकी है, जहां पीढ़ियों से नागरिक न्याय, बदलाव और अपनी आवाज बुलंद करने के लिए एकत्र होते रहे हैं।
भाषा मनीषा माधव
माधव

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